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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) द्वारा हाल ही में जारी किए गए संशोधित वैश्विक वायु गुणवत्ता दिशानिर्देशों (ए.क्यू.जी.) के मुख्य बिन्दुओं का वर्णन कीजिए। विगत 2005 के अद्यतन से, ये किस प्रकार भिन्न हैं ? इन संशोधित मानकों को प्राप्त करने के लिए, भारत के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम में किन परिवर्तनों की आवश्यकता है ? (150 words) [UPSC 2021]
संशोधित वैश्विक वायु गुणवत्ता दिशानिर्देशों (ए.क्यू.जी.) के मुख्य बिन्दु डब्ल्यू.एच.ओ. द्वारा 2021 में जारी किए गए संशोधित वैश्विक वायु गुणवत्ता दिशानिर्देशों में प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित हैं: सख्त मानक: PM2.5 के लिए मानक 10 µg/m³ से घटाकर 5 µg/m³ और PM10 के लिए 20 µg/m³ से घटाकर 15 µg/m³ कर दिए गएRead more
संशोधित वैश्विक वायु गुणवत्ता दिशानिर्देशों (ए.क्यू.जी.) के मुख्य बिन्दु
डब्ल्यू.एच.ओ. द्वारा 2021 में जारी किए गए संशोधित वैश्विक वायु गुणवत्ता दिशानिर्देशों में प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित हैं:
2005 के अद्यतन से भिन्नताएँ
2021 के दिशानिर्देश 2005 की तुलना में अधिक सख्त हैं, जो स्वास्थ्य पर कम प्रदूषण स्तरों के प्रभाव को लेकर बढ़ी हुई वैज्ञानिक जानकारी को दर्शाते हैं। PM2.5 और NO2 के लिए सख्त सीमाएं स्वास्थ्य सुरक्षा के प्रति एक सख्त दृष्टिकोण को उजागर करती हैं।
भारत के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम में आवश्यक परिवर्तन
इन संशोधित मानकों को प्राप्त करने के लिए, भारत को निम्नलिखित परिवर्तनों की आवश्यकता है:
ये बदलाव भारत में अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य मानकों को पूरा करने और वायु गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण होंगे।
See lessनिरंतर उत्पन्न किए जा रहे फेंके गए ठोस कचरे की विशाल मात्राओं का निस्तारण करने में क्या-क्या बाधाएँ हैं? हम अपने रहने योग्य परिवेश में जमा होते जा रहे जहरीले अपशिष्टों को सुरक्षित रूप से किस प्रकार हटा सकते हैं? (150 words) [UPSC 2018]
फेंके गए ठोस कचरे का निस्तारण करने में बाधाएँ: **1. अपर्याप्त अवसंरचना: प्रबंधन सुविधाओं की कमी: कई क्षेत्रों में कचरा संग्रहण, पृथक्करण और निस्तारण के लिए आवश्यक अवसंरचना का अभाव है। उदाहरण के लिए, दिल्ली और अन्य बड़े शहरों में अपर्याप्त कचरा प्रबंधन प्रणाली के कारण कचरे का सही तरीके से निस्तारण नहRead more
फेंके गए ठोस कचरे का निस्तारण करने में बाधाएँ:
**1. अपर्याप्त अवसंरचना:
**2. कचरे का मिश्रण:
**3. बढ़ती कचरा उत्पादन:
जहरीले अपशिष्टों को सुरक्षित रूप से हटाने के उपाय:
**1. सही उपचार विधियाँ:
**2. कानूनी ढांचा:
**3. जन जागरूकता और भागीदारी:
इन बाधाओं को दूर करने और प्रभावी प्रबंधन प्रथाओं को अपनाने से ठोस और जहरीले कचरे के पर्यावरणीय प्रभाव को कम किया जा सकता है।
See lessइसके निर्माण, प्रभाव और शमन को महत्त्व देते हुए फोटोकेमिकल स्मॉग की विस्तारपूर्वक चर्चा कीजिए । 1999 के गोथेनबर्ग प्रोटोकॉल को समझाइए । (150 words)[UPSC 2022]
फोटोकेमिकल स्मॉग: निर्माण, प्रभाव और शमन **1. निर्माण: फोटोकेमिकल स्मॉग तब बनता है जब सूरज की रोशनी वायुमंडल में नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (NOx) और वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स (VOCs) के साथ प्रतिक्रिया करती है। इससे ओज़ोन (O3) और अन्य हानिकारक यौगिक उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली और लॉस एंजेलिस मRead more
फोटोकेमिकल स्मॉग: निर्माण, प्रभाव और शमन
**1. निर्माण:
**2. प्रभाव:
**3. शमन उपाय:
1999 का गोथेनबर्ग प्रोटोकॉल
**1. परिचय:
**2. लक्ष्य और प्रभाव:
गोथेनबर्ग प्रोटोकॉल और शमन उपाय फोटोकेमिकल स्मॉग के प्रभावी प्रबंधन और मानव स्वास्थ्य तथा पर्यावरण की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
See lessपृथ्वी की सतह पर प्रति वर्ष बड़ी मात्रा में वनस्पति पदार्थ, सेलुलोस, जमा हो जाता है। यह सेलुलोस किन प्राकृतिक प्रक्रियाओं से गुज़रता है जिससे कि वह कार्बन डाइऑक्साइड, जल तथा अन्य अंत्य उत्पादों में परिवर्तित हो जाता है ? (150 words)[UPSC 2022]
सेलुलोस के प्राकृतिक विघटन की प्रक्रियाएँ **1. सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटन: सेलुलोस का पहला चरण सूक्ष्मजीवों जैसे बैक्टीरिया और फंगस द्वारा विघटन होता है। उदाहरण के लिए, सोरलिया जैसे फंगस वनों में सेलुलोस को छोटे-छोटे यौगिकों में तोड़ते हैं। **2. ह्यूमस का निर्माण: सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटन के बाद, ह्Read more
सेलुलोस के प्राकृतिक विघटन की प्रक्रियाएँ
**1. सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटन:
**2. ह्यूमस का निर्माण:
**3. सेलुलोस किण्वन:
**4. कार्बन संचयन और उत्सर्जन:
हालिया उदाहरण:
इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से सेलुलोस को कार्बन डाइऑक्साइड, जल और अन्य अंत्य उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है, जो वैश्विक कार्बन चक्र और मृदा स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
See lessइलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाना दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहा है। कार्बन उत्सर्जन को कम करने में इलेक्ट्रिक वाहन कैसे योगदान करते हैं और पारंपरिक दहन इंजन वाहनों की तुलना में वे क्या प्रमुख लाभ प्रदान करते हैं? (250 words) [UPSC 2023]
इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) का कार्बन उत्सर्जन को कम करने में योगदान कार्बन उत्सर्जन को कम करने में योगदान: कम टेलपाइप उत्सर्जन: इलेक्ट्रिक वाहनों में कोई टेलपाइप उत्सर्जन नहीं होता, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (NOx) जैसे प्रदूषकों की मात्रा में कमी आती है। 2023 में इंटरनेशनल काRead more
इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) का कार्बन उत्सर्जन को कम करने में योगदान
कार्बन उत्सर्जन को कम करने में योगदान:
पारंपरिक दहन इंजन वाहनों की तुलना में प्रमुख लाभ:
संक्षेप में, इलेक्ट्रिक वाहन कार्बन उत्सर्जन को महत्वपूर्ण रूप से कम करने में योगदान करते हैं और पारंपरिक दहन इंजन वाहनों की तुलना में कम संचालन लागत, बेहतर वायु गुणवत्ता, और सरकारी प्रोत्साहन जैसे प्रमुख लाभ प्रदान करते हैं।
See lessतेल प्रदूषण क्या है? समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर इसके प्रभाव क्या हैं? भारत जैसे देश के लिए किस तरह से तेल प्रदूषण विशेष रूप से हानिकारक है? (150 words)[UPSC 2023]
तेल प्रदूषण: तेल प्रदूषण तब होता है जब पेट्रोलियम उत्पाद, विशेषकर समुद्री तेल के रिसाव, जहाजों, ऑफशोर ड्रिलिंग रिग्स, या दुर्घटनाओं के कारण जलस्रोतों में मिल जाते हैं। यह प्रदूषण समुद्री और स्थलीय दोनों पर्यावरणों को प्रभावित कर सकता है। समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव: समुद्री जीवन को खतरा: तेRead more
तेल प्रदूषण: तेल प्रदूषण तब होता है जब पेट्रोलियम उत्पाद, विशेषकर समुद्री तेल के रिसाव, जहाजों, ऑफशोर ड्रिलिंग रिग्स, या दुर्घटनाओं के कारण जलस्रोतों में मिल जाते हैं। यह प्रदूषण समुद्री और स्थलीय दोनों पर्यावरणों को प्रभावित कर सकता है।
समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव:
भारत के लिए विशेष हानि:
निष्कर्ष: तेल प्रदूषण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर विनाशकारी प्रभाव डालता है और भारत जैसे देश के लिए, जिसकी तटीय क्षेत्रीय और संसाधनों पर बड़ी निर्भरता है, इसके परिणाम विशेष रूप से गंभीर हो सकते हैं।
See lessभारत में जैव-चिकित्सा अपशिष्ट (BMW) प्रबंधन में विद्यमान चुनौतियों की विवेचना कीजिए। साथ ही, इस संदर्भ में जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2018 की मुख्य विशेषताओं को रेखांकित कीजिए। (उत्तर 250 शब्दों में दें)
भारत में जैव-चिकित्सा अपशिष्ट (BMW) प्रबंधन में चुनौतियाँ: अवसंरचना की कमी: कई स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों में जैव-चिकित्सा अपशिष्ट के सही संग्रहण, पृथक्करण और निपटान के लिए आवश्यक अवसंरचना और सुविधाओं की कमी है। अपशिष्ट प्रबंधन उपकरण और सुविधाएं अक्सर अपर्याप्त होती हैं। पृथक्करण की कमी: जैव-चिकित्सRead more
भारत में जैव-चिकित्सा अपशिष्ट (BMW) प्रबंधन में चुनौतियाँ:
अवसंरचना की कमी: कई स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों में जैव-चिकित्सा अपशिष्ट के सही संग्रहण, पृथक्करण और निपटान के लिए आवश्यक अवसंरचना और सुविधाओं की कमी है। अपशिष्ट प्रबंधन उपकरण और सुविधाएं अक्सर अपर्याप्त होती हैं।
पृथक्करण की कमी: जैव-चिकित्सा अपशिष्ट को अन्य सामान्य कचरे से पृथक रूप से संग्रहित नहीं किया जाता, जिससे संदूषण का खतरा बढ़ जाता है और प्रभावी निपटान में कठिनाई होती है।
प्रशिक्षण की कमी: स्वास्थ्य देखभाल कर्मियों और अन्य संबंधित व्यक्तियों को जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन के सही तरीके के बारे में पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिलता, जो प्रबंधन की दक्षता को प्रभावित करता है।
विधानिक अनुपालन की कमी: कई संस्थानों में नियमों और मानकों का पालन नहीं होता, जिससे अपशिष्ट प्रबंधन के मानक पूरे नहीं हो पाते।
जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2018 की मुख्य विशेषताएँ:
क्लासिफिकेशन और रूटीन अपडेट: अपशिष्ट के प्रकार और प्रबंधन के लिए अद्यतन वर्गीकरण प्रदान करता है, और अपशिष्ट की प्रबंधन प्रक्रिया में सुधार के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित करता है।
ऑनलाइन रिपोर्टिंग और ट्रैकिंग: नियमों के तहत, स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों को अपशिष्ट प्रबंधन की गतिविधियों की ऑनलाइन रिपोर्टिंग और ट्रैकिंग करने की आवश्यकता होती है। यह पारदर्शिता और निगरानी में सुधार करता है।
स्वच्छता मानक और प्रशिक्षण: अपशिष्ट प्रबंधन के लिए नए स्वच्छता मानक निर्धारित किए गए हैं और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए प्रशिक्षण प्रोटोकॉल को अनिवार्य किया गया है।
निपटान प्रक्रियाओं में सुधार: अपशिष्ट निपटान के लिए स्वीकृत प्रक्रियाओं को मजबूत किया गया है, जिसमें जलाने, ठोस अपशिष्ट के लिए सुरक्षित निपटान और पुनः उपयोग की विधियाँ शामिल हैं।
इन नियमों का उद्देश्य जैव-चिकित्सा अपशिष्ट के सुरक्षित प्रबंधन को सुनिश्चित करना और स्वास्थ्य जोखिमों को कम करना है, जिससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को संरक्षित किया जा सके।
See lessसमुद्री कचरे के पर्यावरणीय प्रभावों पर प्रकाश डालिए। साथ ही, चर्चा कीजिए कि समुद्री कचरे का प्रबंधन करना कठिन क्यों है। (उत्तर 150 शब्दों में दें)
समुद्री कचरे के पर्यावरणीय प्रभाव गंभीर और व्यापक हैं: पारिस्थितिक तंत्र पर प्रभाव: समुद्री कचरा, विशेषकर प्लास्टिक, समुद्री जीवन जैसे मछलियाँ, कछुए और पक्षियों के लिए हानिकारक है। ये जीव कचरे को गलती से खा लेते हैं, जिससे उनकी मौत या स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। प्लास्टिक प्रदूषण: प्लास्टिक समुदRead more
समुद्री कचरे के पर्यावरणीय प्रभाव गंभीर और व्यापक हैं:
पारिस्थितिक तंत्र पर प्रभाव: समुद्री कचरा, विशेषकर प्लास्टिक, समुद्री जीवन जैसे मछलियाँ, कछुए और पक्षियों के लिए हानिकारक है। ये जीव कचरे को गलती से खा लेते हैं, जिससे उनकी मौत या स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।
प्लास्टिक प्रदूषण: प्लास्टिक समुद्र में टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाता है, जो खाद्य श्रृंखला में समाहित हो जाता है और जलीय जीवों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
कोरल रीफ्स को नुकसान: कचरा, जैसे कि धातु और प्लास्टिक, कोरल रीफ्स को शारीरिक और रासायनिक रूप से नुकसान पहुंचाता है, जिससे रीफ्स का जीवन संकट में पड़ता है।
समुद्री कचरे का प्रबंधन कठिन है क्योंकि:
विस्तृत वितरण: समुद्री कचरा दुनिया भर में फैला हुआ है और इसके स्रोत कई हैं, जिससे ट्रैकिंग और हटाने में कठिनाई होती है।
पारंपरिक सफाई विधियों की सीमाएँ: समुद्री कचरे को निकालना और नष्ट करना महंगा और जटिल होता है, विशेष रूप से बड़े और कड़े कचरे के लिए।
विविधता और स्थायित्व: कचरे की विविधता और प्लास्टिक जैसे सामग्री की स्थायित्व इसे लंबे समय तक समुद्र में बने रहने की क्षमता देती है, जिससे निपटना मुश्किल हो जाता है।
समुद्री कचरे के प्रबंधन के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और नवाचार आवश्यक हैं।
See lessभारत में बढ़ते शहरीकरण और ध्वनि प्रदूषण के बीच संबंधों पर चर्चा कीजिए। मानव स्वास्थ्य पर ध्वनि प्रदूषण के प्रभावों का वर्णन कीजिए।(150 शब्दों में उत्तर दें)
भारत में बढ़ते शहरीकरण और ध्वनि प्रदूषण के बीच गहरा संबंध है। शहरीकरण के साथ-साथ जनसंख्या वृद्धि और औद्योगिकीकरण ने शहरों में ध्वनि प्रदूषण को बढ़ा दिया है। यातायात, निर्माण गतिविधियाँ, और उद्योगों से निकलने वाली ध्वनि अत्यधिक शोर को जन्म देती है, जो शहरी जीवन का हिस्सा बन चुका है। ध्वनि प्रदूषण काRead more
भारत में बढ़ते शहरीकरण और ध्वनि प्रदूषण के बीच गहरा संबंध है। शहरीकरण के साथ-साथ जनसंख्या वृद्धि और औद्योगिकीकरण ने शहरों में ध्वनि प्रदूषण को बढ़ा दिया है। यातायात, निर्माण गतिविधियाँ, और उद्योगों से निकलने वाली ध्वनि अत्यधिक शोर को जन्म देती है, जो शहरी जीवन का हिस्सा बन चुका है।
ध्वनि प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। लंबे समय तक उच्च स्तर के शोर exposure से सुनने की क्षमता में कमी, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, और नींद में बाधा जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव होता है, जैसे कि तनाव, चिंता, और अवसाद। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका प्रभाव विशेष रूप से अधिक होता है, जिससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को खतरा होता है।
इसलिए, शहरीकरण के साथ ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए ठोस उपाय आवश्यक हैं।
See lessराष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के परिणाम का मूल्यांकन कीजिए। मिशन LIFE वायु प्रदूषण के मुद्दे का समाधान करने में NCAP को कैसे पुनर्जीवित कर सकता है? (150 शब्दों में उत्तर दीजिए)
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) का मूल्यांकन दर्शाता है कि यह वायु प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए एक प्रभावी पहल रही है, लेकिन इसके परिणाम सीमित रहे हैं। NCAP ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए राज्यों को निधि और तकनीकी सहायता प्रदान की है, लेकिन वायु प्रदूषण में कमी के लक्ष्यों को पूरा करनेRead more
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) का मूल्यांकन दर्शाता है कि यह वायु प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए एक प्रभावी पहल रही है, लेकिन इसके परिणाम सीमित रहे हैं। NCAP ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए राज्यों को निधि और तकनीकी सहायता प्रदान की है, लेकिन वायु प्रदूषण में कमी के लक्ष्यों को पूरा करने में चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
मिशन LIFE (Lifestyle for Environment) NCAP को पुनर्जीवित करने में मदद कर सकता है। इस मिशन के तहत, व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर पर्यावरणीय जागरूकता और व्यवहार में बदलाव को प्रोत्साहित किया जाएगा। इससे:
सार्वजनिक सहभागिता: लोगों को वायु प्रदूषण कम करने की जिम्मेदारी और उपायों की जानकारी मिल सकेगी।
See lessउचित संसाधन प्रबंधन: मिशन LIFE के तहत स्थायी जीवनशैली अपनाने से, वायु गुणवत्ता में सुधार होगा।
नीति सुधार: बेहतर सामुदायिक और व्यक्तिगत दृष्टिकोण के साथ, NCAP की रणनीतियों को सुदृढ़ किया जा सकता है।
इस प्रकार, मिशन LIFE वायु प्रदूषण की चुनौती को प्रभावी रूप से संबोधित करने में NCAP को सहायता प्रदान कर सकता है।