What do you know about NRC dispute? Illuminate the political intentions behind it. Discuss the international impacts of this issue also. [63th BPSC Mains Exam 2017]
भारतीय शासन में न्यायिक सक्रियता: भारतीय संविधान में न्यायपालिका को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अधिकार दिया गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि शासन के सभी अंग संविधान और कानून के अनुसार कार्य करें। न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) एक ऐसी अवधारणा है जिसमें न्यायपालिका, केवल मुकदमों के निपRead more
भारतीय शासन में न्यायिक सक्रियता:
भारतीय संविधान में न्यायपालिका को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अधिकार दिया गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि शासन के सभी अंग संविधान और कानून के अनुसार कार्य करें। न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) एक ऐसी अवधारणा है जिसमें न्यायपालिका, केवल मुकदमों के निपटारे तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की समीक्षा भी करती है। यह एक ऐसा दृष्टिकोण है जिसमें न्यायिक संस्थाएँ समाज में व्याप्त असमानताओं और अन्याय को दूर करने के लिए सक्रिय रूप से कदम उठाती हैं।
न्यायिक सक्रियता की उत्पत्ति
भारत में न्यायिक सक्रियता का आरंभ 1970 के दशक के अंत में हुआ, विशेष रूप से जब सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिकाओं (Public Interest Litigation – PIL) को स्वीकार करना शुरू किया। इसने आम नागरिकों को यह अधिकार दिया कि वे न्यायपालिका से उन मुद्दों पर न्याय की अपील कर सकते हैं जो समाज में व्यापक प्रभाव डालते हैं, जैसे कि पर्यावरण संरक्षण, भ्रष्टाचार, महिला अधिकार आदि।
उदाहरण:
- केशवानंद भारती केस (1973): यह केस भारतीय संविधान के मौलिक ढांचे के सिद्धांत को स्थापित करने वाला था, जिसमें न्यायपालिका ने अपनी सक्रिय भूमिका निभाई और यह निर्णय दिया कि संसद संविधान के मूल अधिकारों को बदलने का अधिकार नहीं रखती।
- आधार फैसला (2018): भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने आधार योजना को संवैधानिक रूप से चुनौती दी और कहा कि यह नागरिकों के निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है। इसने न्यायपालिका की सक्रियता को और प्रकट किया।
न्यायिक सक्रियता के पक्ष में तर्क
- संविधान के उद्देश्यों की रक्षा:
- न्यायिक सक्रियता न्यायपालिका को संविधान के उद्देश्यों की रक्षा करने में मदद करती है, खासकर जब अन्य अंग अपने कार्यों में विफल रहते हैं।
- उदाहरण: विरोधी नागरिक अधिकारों की रक्षा – जब सरकार ने नागरिक अधिकारों के उल्लंघन की ओर ध्यान नहीं दिया, तो न्यायपालिका ने अपनी सक्रियता दिखाकर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की।
- राजनीतिक और सामाजिक असमानताओं का समाधान:
- न्यायिक सक्रियता समाज में व्याप्त असमानताओं को दूर करने के लिए एक मंच प्रदान करती है, खासकर जब विधायिका और कार्यपालिका इसे अनदेखा करती हैं।
- उदाहरण: श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा – न्यायपालिका ने कई मामलों में श्रमिकों के अधिकारों का बचाव किया है, जब सरकार ने या प्रबंधन ने उनकी अनदेखी की।
- जनहित याचिका (PIL):
- यह प्रक्रिया न्यायपालिका को उन मुद्दों पर विचार करने का अवसर देती है, जो आम जनता के हित में होते हैं।
- उदाहरण: नदियों की सफाई, पर्यावरण संरक्षण – न्यायपालिका ने कई मामलों में नदियों के प्रदूषण और पर्यावरणीय नुकसान को लेकर आदेश दिए।
न्यायिक सक्रियता के विपक्ष में तर्क
- विधायिका और कार्यपालिका के अधिकारों का उल्लंघन:
- आलोचकों का कहना है कि न्यायपालिका की सक्रियता कभी-कभी विधायिका और कार्यपालिका के अधिकारों में अतिक्रमण करती है।
- उदाहरण: अगर न्यायपालिका कानून बनाने में हस्तक्षेप करती है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ हो सकता है।
- राजनीतिक हस्तक्षेप:
- न्यायिक सक्रियता में कभी-कभी राजनीतिक रंग भी देखा जाता है, जहां न्यायपालिका के फैसले राजनीतिक मुद्दों से प्रेरित हो सकते हैं।
- उदाहरण: कई बार यह आरोप लगाए जाते हैं कि कुछ न्यायिक निर्णय सरकार के खिलाफ राजनीतिक दबाव में लिए जाते हैं।
- अधिकारिता की सीमाएँ:
- न्यायपालिका को अपने निर्णयों में सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि यह उसकी प्राथमिकता नहीं है कि वह विधायिका या कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप करे।
- उदाहरण: न्यायिक सक्रियता की आलोचना तब की जाती है जब न्यायपालिका अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर किसी नीति पर टिप्पणी करती है।
निष्कर्ष
न्यायिक सक्रियता भारतीय संविधान के तहत न्यायपालिका के अधिकारों और कर्तव्यों को पूरा करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि, न्यायपालिका की भूमिका को अत्यधिक सक्रिय और जनहित में रखना सकारात्मक हो सकता है, परंतु इसे सीमित करने की आवश्यकता भी है ताकि यह अन्य सरकारी अंगों के अधिकारों का उल्लंघन न करे। यह जरूरी है कि न्यायपालिका अपनी भूमिका को संवैधानिक सीमाओं में रहते हुए निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से निभाए।
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The National Register of Citizens (NRC) is a register designed to identify Indian citizens and exclude illegal immigrants. Originally implemented in Assam, the NRC gained national attention when discussions arose about expanding it across India. The Assam NRC, updated in 2019, aimed to address the lRead more
The National Register of Citizens (NRC) is a register designed to identify Indian citizens and exclude illegal immigrants. Originally implemented in Assam, the NRC gained national attention when discussions arose about expanding it across India. The Assam NRC, updated in 2019, aimed to address the long-standing issue of illegal immigration from Bangladesh. However, its execution and potential nationwide implementation have sparked significant debate.
Key Features of the NRC
Political Intentions Behind the NRC
International Impacts of the NRC
Illustrations
Conclusion
The NRC remains one of India’s most contentious issues, deeply intertwined with political, social, and humanitarian dimensions. While the government argues it is a necessary step to secure borders and resources, critics see it as a politically motivated tool that risks marginalizing vulnerable populations.
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