“भारत में राष्ट्रीय राजनैतिक दल केन्द्रीयकरण के पक्ष में हैं, जबकि क्षेत्रीय दल राज्य-स्वायत्तता के पक्ष में ।” टिप्पणी कीजिए। (250 words) [UPSC 2022]
राज्यपाल द्वारा विधायी शक्तियों के प्रयोग की आवश्यक शर्तें: संवैधानिक प्रावधान: राज्यपाल की विधायी शक्तियाँ भारतीय संविधान के तहत निर्धारित होती हैं। इनमें विधायिका को बुलाना, स्थगित करना या भंग करना, और विधेयकों पर सहमति देना या अस्वीकृत करना शामिल है। इन शक्तियों का प्रयोग संविधान और विधायी प्रक्रRead more
राज्यपाल द्वारा विधायी शक्तियों के प्रयोग की आवश्यक शर्तें:
- संवैधानिक प्रावधान: राज्यपाल की विधायी शक्तियाँ भारतीय संविधान के तहत निर्धारित होती हैं। इनमें विधायिका को बुलाना, स्थगित करना या भंग करना, और विधेयकों पर सहमति देना या अस्वीकृत करना शामिल है। इन शक्तियों का प्रयोग संविधान और विधायी प्रक्रियाओं के अनुसार होना चाहिए।
- मंत्रियों की सलाह: संविधान के अनुच्छेद 163 के अनुसार, राज्यपाल को मुख्य मंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही अधिकांश विधायी कार्य करना होता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्यपाल अपनी विवेकाधीन शक्तियों का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन सामान्यतः वे मंत्रियों की सलाह के अनुसार कार्य करते हैं।
- लोक प्रतिनिधित्व: राज्यपाल द्वारा की गई कार्रवाइयाँ जनता के प्रतिनिधियों के हितों और सरकार के प्रभावी संचालन के साथ मेल खानी चाहिए।
राज्यपाल द्वारा अध्यादेशों के पुनःप्रख्यापन की वैधता:
अध्यादेशों का पुनःप्रख्यापन बिना विधायिका के समक्ष पेश किए संविधान की प्रावधानों के खिलाफ होता है। अध्यादेश, अनुच्छेद 123 और अनुच्छेद 213 के तहत, तब जारी किए जाते हैं जब विधायिका सत्र में नहीं होती और तत्काल कदम उठाना आवश्यक हो।
मुख्य बिंदु:
- अस्थायी स्वभाव: अध्यादेश अस्थायी उपाय होते हैं और इन्हें विधायिका के समक्ष पेश किया जाना चाहिए जैसे ही वह सत्र में आती है। पुनःप्रख्यापन बिना विधायिका के समक्ष पेश किए एक असंवैधानिक प्रक्रिया है।
- न्यायिक निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने कृष्ण कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (2017) मामले में फैसला सुनाया कि अध्यादेशों का बार-बार पुनःप्रख्यापन बिना विधायिका की स्वीकृति के असंवैधानिक है। न्यायालय ने इसे शक्ति का दुरुपयोग और विधायी प्रक्रिया का उल्लंघन माना।
- जवाबदेही और निगरानी: विधायिका अध्यादेशों पर निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करती है। पुनःप्रख्यापन के माध्यम से विधायिका की भूमिका को नकारना संविधान और लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है।
इस प्रकार, राज्यपाल की विधायी शक्तियाँ संविधान और मंत्रियों की सलाह के तहत सीमित होती हैं, और अध्यादेशों का पुनःप्रख्यापन विधायिका की स्वीकृति के बिना असंवैधानिक होता है।
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भारत में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनैतिक दलों के बीच केंद्रीयकरण और राज्य-स्वायत्तता के मुद्दे पर विभिन्न दृष्टिकोण हैं, जो देश के संघीय ढांचे की जटिलता को दर्शाते हैं। राष्ट्रीय राजनैतिक दल और केंद्रीयकरण: राष्ट्रीय दल जैसे भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई.एन.सी.) केंदRead more
भारत में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनैतिक दलों के बीच केंद्रीयकरण और राज्य-स्वायत्तता के मुद्दे पर विभिन्न दृष्टिकोण हैं, जो देश के संघीय ढांचे की जटिलता को दर्शाते हैं।
राष्ट्रीय राजनैतिक दल और केंद्रीयकरण: राष्ट्रीय दल जैसे भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई.एन.सी.) केंद्रीयकरण के पक्षधर होते हैं। उनका मानना है कि केंद्रीयकरण से पूरे देश में एक समान नीतियों और कानूनों का कार्यान्वयन संभव होता है, जिससे राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बढ़ावा मिलता है। केंद्रीयकरण से सरकार को संसाधनों का बेहतर वितरण, और एकीकृत राष्ट्रीय रणनीतियों का निर्माण करना आसान होता है, जो विभिन्न राज्यों में समान विकास और नीति प्रभावी बनाने में सहायक होता है।
क्षेत्रीय राजनैतिक दल और राज्य-स्वायत्तता: इसके विपरीत, क्षेत्रीय दल जैसे द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डी.एम.के.), तृणमूल कांग्रेस (टी.एम.सी.), और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टी.आर.एस.) राज्य-स्वायत्तता के पक्षधर होते हैं। वे तर्क करते हैं कि स्थानीय सरकारें अपने क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं और समस्याओं को बेहतर ढंग से समझ सकती हैं और उन्हें संबोधित कर सकती हैं। राज्य-स्वायत्तता से राज्यों को अपने संसाधनों और नीतियों पर अधिक नियंत्रण मिलता है, जिससे स्थानीय विकास को बढ़ावा मिलता है और सांस्कृतिक विविधताओं को संरक्षित किया जा सकता है।
विवाद और सहयोग: इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच मतभेद भारत के संघीय ढांचे को चुनौती देते हैं। केंद्रीयकरण राष्ट्रीय एकता और समरसता को बढ़ावा देता है, जबकि राज्य-स्वायत्तता क्षेत्रीय विविधताओं और स्थानीय स्वायत्तता को महत्व देती है। भारतीय संविधान ने इन दोनों पहलुओं को संतुलित करने के लिए एक संघीय ढांचा प्रदान किया है, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति का विभाजन सुनिश्चित किया गया है।
इस प्रकार, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के दृष्टिकोणों के बीच संघर्ष और सहयोग भारत के संघीय ढांचे की जटिलताओं को उजागर करते हैं, जहां केंद्र और राज्य दोनों की भूमिकाएं महत्वपूर्ण हैं।
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