वर्ण व्यवस्था पर गाँधी के विचारों का मूल्यांकन कीजिये। (125 Words) [UPPSC 2020]
भगत सिंह का 'क्रान्तिकारी दर्शन' भगत सिंह भारत की स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे। उनका 'क्रान्तिकारी दर्शन' मार्क्सवाद, समाजवाद और साम्राज्यवाद-विरोधी विचारों से प्रभावित था। इसके कुछ प्रमुख पहलु हैं: साम्राज्यवाद-विरोध और राष्ट्रवाद: भगत सिंह ब्रिटिशRead more
भगत सिंह का ‘क्रान्तिकारी दर्शन’
भगत सिंह भारत की स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे। उनका ‘क्रान्तिकारी दर्शन’ मार्क्सवाद, समाजवाद और साम्राज्यवाद-विरोधी विचारों से प्रभावित था। इसके कुछ प्रमुख पहलु हैं:
- साम्राज्यवाद-विरोध और राष्ट्रवाद: भगत सिंह ब्रिटिश साम्राज्यवाद के जबरदस्त विरोधी थे। उन्होंने मानाकि क्रान्तिकारी आंदोलन का अंतिम लक्ष्य भारत की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना होना चाहिए।
- समाजवाद और वर्गीय संघर्ष: भगत सिंह मार्क्सवाद से प्रभावित थे और वर्गीय संघर्ष के विचार में विश्वास रखते थे। उन्होंने भारतीय समाज का समाजवादी रूपांतरण का समर्थन किया, जहाँ श्रमिक वर्ग का शोषण समाप्त हो।
- तर्कवाद और धर्मनिरपेक्षता: भगत सिंह एक तर्कवादी और धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे। वे राजनीति में धर्म के प्रभाव का विरोध करते थे और मानते थे कि क्रान्तिकारी आंदोलन को वैज्ञानिक और तार्किक सिद्धान्तों पर आधारित होना चाहिए।
- क्रान्तिकारी हिंसा: भगत सिंह का मानना था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सशस्त्र क्रांति आवश्यक है। उन्होंने औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ हिंसा का समर्थन किया, यह तर्क देते हुए कि यह दमनकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का एकमात्र तरीका है।
भगत सिंह के आदर्शों को दर्शाने वाले हालिया उदाहरण:
- 2022 में मनाए गए ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ समारोह में भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियों का योगदान सम्मानित किया गया।
- 2022 में चंडीगढ़ हवाई अड्डे का ‘शहीद भगत सिंह अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा’ नाम रखना भगत सिंह के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान को मान्यता देता है।
- 2023 में लुधियाना, पंजाब में ‘शहीद भगत सिंह अनुसंधान संस्थान’ की स्थापना भगत सिंह के जीवन और विचारों से संबंधित अनुसंधान और विद्वत् गतिविधियों को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य रखती है।
संक्षेप में, भगत सिंह का ‘क्रान्तिकारी दर्शन’ भारत में सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए चलने वाले चल रहे संघर्ष को प्रेरित और मार्गदर्शित करता है। उनका साम्राज्यवाद-विरोध, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्धता आज भी प्रासंगिक है।
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गांधी के वर्ण व्यवस्था पर विचार महात्मा गांधी ने वर्ण व्यवस्था को एक आदर्श सामाजिक प्रणाली के रूप में देखा, जो व्यक्ति की योग्यता और कर्तव्यों पर आधारित थी, न कि जाति या जन्म पर। गांधीजी ने वर्ण व्यवस्था को सामाजिक समरसता और संगठन का साधन माना, जिससे समाज में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता अनुसार भRead more
गांधी के वर्ण व्यवस्था पर विचार
महात्मा गांधी ने वर्ण व्यवस्था को एक आदर्श सामाजिक प्रणाली के रूप में देखा, जो व्यक्ति की योग्यता और कर्तव्यों पर आधारित थी, न कि जाति या जन्म पर। गांधीजी ने वर्ण व्यवस्था को सामाजिक समरसता और संगठन का साधन माना, जिससे समाज में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता अनुसार भूमिका निभाने का अवसर मिलता।
हालांकि, गांधी ने जातिवाद और अछूतों के प्रति भेदभाव की निंदा की। उन्होंने अछूतों के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों की रक्षा की और उनकी स्थिति में सुधार के लिए सक्रिय रूप से काम किया।
गांधी का दृष्टिकोण था कि वर्ण व्यवस्था का सुधार और आधुनिकीकरण होना चाहिए, ताकि यह जातिवाद और सामाजिक असमानता को समाप्त कर सके।
निष्कर्ष: गांधी का वर्ण व्यवस्था पर दृष्टिकोण सुधारात्मक था, जिसमें सामाजिक न्याय और समरसता को प्राथमिकता दी गई।
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