आधारभूत ढाँचे का सिद्धांत’ से आप क्या समझते हैं? भारतीय संविधान के लिये इसके महत्त्व का विश्लेषण कीजिये। (200 Words) [UPPSC 2019]
भारतीय संविधान, जो विश्व भर के विभिन्न संविधानों के तत्वों का मिश्रण है, अपने व्यापक और समावेशी प्रावधानों के माध्यम से सामाजिक न्याय, बहुलवाद और समानता की अवधारणाओं को आत्मसात करता है। संविधान की प्रस्तावना, जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की गारंटी देती है, भारतीय लोकतंत्र की मूलभूत मान्यताओंRead more
भारतीय संविधान, जो विश्व भर के विभिन्न संविधानों के तत्वों का मिश्रण है, अपने व्यापक और समावेशी प्रावधानों के माध्यम से सामाजिक न्याय, बहुलवाद और समानता की अवधारणाओं को आत्मसात करता है। संविधान की प्रस्तावना, जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की गारंटी देती है, भारतीय लोकतंत्र की मूलभूत मान्यताओं को दर्शाती है।
सामाजिक न्याय की दिशा में, भारतीय संविधान विशेष रूप से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित नौकरियों और शिक्षा के अवसरों की व्यवस्था करता है। अनुच्छेद 15 और 16 जाति, धर्म, लिंग, या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करते हैं। इसके अतिरिक्त, सामाजिक और आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए विभिन्न योजनाएं और कानून बनाए गए हैं।
बहुलवाद को अपनाने में, भारतीय संविधान विभिन्न धार्मिक, भाषाई और सांस्कृतिक समूहों के अधिकारों की रक्षा करता है। अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी संस्कृति, भाषा और शिक्षा के अधिकार प्रदान करते हैं। यह बहुलवादी संस्कृति को प्रोत्साहित करता है और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देता है।
समानता की दिशा में, संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है और कानून के समक्ष समानता की गारंटी करता है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को उसके धर्म, जाति, लिंग, या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव का सामना न करना पड़े।
इन प्रावधानों के माध्यम से, भारतीय संविधान न केवल विश्व के विभिन्न संविधानों से प्रेरित है, बल्कि अपने अद्वितीय दृष्टिकोण से सामाजिक न्याय, बहुलवाद और समानता को मजबूत करता है, जो भारतीय समाज की विविधता और समृद्धि को प्रतिबिंबित करता है।
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आधारभूत ढाँचे का सिद्धांत क्या है? **1. परिभाषा और उत्पत्ति 'आधारभूत ढाँचे का सिद्धांत' भारतीय न्यायपालिका द्वारा स्थापित एक न्यायिक सिद्धांत है, जिसका तात्पर्य है कि संविधान के कुछ मूलभूत तत्वों को किसी भी संशोधन के द्वारा नष्ट या परिवर्तित नहीं किया जा सकता। यह सिद्धांत केसवानंद भारती मामले (1973)Read more
आधारभूत ढाँचे का सिद्धांत क्या है?
**1. परिभाषा और उत्पत्ति
‘आधारभूत ढाँचे का सिद्धांत’ भारतीय न्यायपालिका द्वारा स्थापित एक न्यायिक सिद्धांत है, जिसका तात्पर्य है कि संविधान के कुछ मूलभूत तत्वों को किसी भी संशोधन के द्वारा नष्ट या परिवर्तित नहीं किया जा सकता। यह सिद्धांत केसवानंद भारती मामले (1973) में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय से उत्पन्न हुआ, जहाँ कोर्ट ने निर्णय दिया कि संसद को संविधान को संशोधित करने की व्यापक शक्ति है, परंतु वह संविधान के “आधारभूत ढाँचे” को बदल नहीं सकती।
**2. सिद्धांत के मुख्य तत्व
इस सिद्धांत के तहत, संविधान के कुछ मूलभूत तत्व होते हैं जिन्हें सुरक्षित रखा जाता है, जैसे:
भारतीय संविधान के लिए महत्त्व
**1. मूलभूत मूल्यों की सुरक्षा
यह सिद्धांत भारतीय संविधान के मूलभूत मूल्यों और विचारधारा की सुरक्षा करता है। उदाहरण के लिए, गोलकनाथ मामले (1967) और केसवानंद भारती मामले (1973) में यह सिद्धांत लोकतांत्रिक सिद्धांतों और कानूनी राज्य को बनाए रखने में सहायक रहा है।
**2. संसदीय शक्तियों की सीमा
इस सिद्धांत के माध्यम से, सुप्रीम कोर्ट ने संसदीय शक्तियों का संतुलन बनाए रखा है और सुनिश्चित किया है कि संविधान में कोई भी संशोधन मूलभूत तत्वों को कमजोर नहीं कर सकता। इससे संसदीय शक्ति की पूर्णता को सीमित किया गया है, जैसे कि एस.आर. बोम्मई मामला (1994) में संघीयता की सुरक्षा की गई।
**3. न्यायिक स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा
यह सिद्धांत न्यायिक स्वतंत्रता और मूल अधिकारों की रक्षा करता है। के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत सरकार (2017) मामले में, कोर्ट ने यह माना कि गोपनीयता का अधिकार भी संविधान के आधारभूत ढाँचे का हिस्सा है, जिससे मूल अधिकारों की सुरक्षा को सुनिश्चित किया गया।
निष्कर्ष
‘आधारभूत ढाँचे का सिद्धांत’ भारतीय संविधान की मौलिक मूल्यों और सिद्धांतों की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संविधान की संरचना और लोकतांत्रिक संस्थाओं को स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और संविधान के मूलभूत तत्वों को किसी भी संभावित संशोधन से सुरक्षित करता है।
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