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भारत के आमचुनाव में मतदाता निरीक्षण पेपर ऑडिट ट्रायल (VVPAT) के प्रयोग का मूल्यांकन कीजिये।(125 Words) [UPPSC 2018]
मतदाता निरीक्षण पेपर ऑडिट ट्रायल (VVPAT) का मूल्यांकन 1. पारदर्शिता और विश्वास: VVPAT प्रणाली ने मतदान की पारदर्शिता और विश्वास को बढ़ाया है। यह सुनिश्चित करती है कि मतदाता की पर्ची का रिकॉर्ड डिजिटल वोटिंग के साथ मेल खाता है। हाल के लोकसभा चुनाव (2019) में, VVPAT ने चुनाव परिणामों की सटीकता को सुनिRead more
मतदाता निरीक्षण पेपर ऑडिट ट्रायल (VVPAT) का मूल्यांकन
1. पारदर्शिता और विश्वास: VVPAT प्रणाली ने मतदान की पारदर्शिता और विश्वास को बढ़ाया है। यह सुनिश्चित करती है कि मतदाता की पर्ची का रिकॉर्ड डिजिटल वोटिंग के साथ मेल खाता है। हाल के लोकसभा चुनाव (2019) में, VVPAT ने चुनाव परिणामों की सटीकता को सुनिश्चित किया।
2. विवाद समाधान: VVPAT की उपस्थिति ने विवादित मतपत्रों के मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कर्नाटक विधानसभा चुनाव (2018) में, VVPAT ने मतपत्रों की सटीकता की पुष्टि करने में मदद की, जिससे मतदाता के संदेहों का समाधान हुआ।
3. तकनीकी और प्रशासनिक चुनौती: VVPAT प्रणाली को लागू करने में तकनीकी और प्रशासनिक चुनौतियाँ सामने आई हैं, जैसे कि मशीनों में तकनीकी खराबियाँ और पुन: गणना में समय की देरी। इन समस्याओं का समाधान करना आवश्यक है ताकि प्रणाली की प्रभावशीलता और विश्वसनीयता बनी रहे।
VVPAT का उपयोग भारतीय चुनावों में लोकतंत्र के प्रति विश्वास और सटीकता को बढ़ाने में सहायक रहा है, लेकिन इसके साथ जुड़ी समस्याओं का समाधान भी आवश्यक है।
See lessफर्स्ट पास्ट द पोस्ट व्यवस्था' का भारतीय संदर्भ में आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ व्यवस्था का भारतीय संदर्भ में आलोचनात्मक मूल्यांकन परिचय ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ (FPTP) चुनावी व्यवस्था एक ऐसी प्रणाली है जिसमें चुनावी क्षेत्र में सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार जीतता है, भले ही उसे कुल मतों का बहुमत न मिले। भारत में इस व्यवस्था का उपयोग लोकसभा और कईRead more
फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ व्यवस्था का भारतीय संदर्भ में आलोचनात्मक मूल्यांकन
परिचय
‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ (FPTP) चुनावी व्यवस्था एक ऐसी प्रणाली है जिसमें चुनावी क्षेत्र में सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार जीतता है, भले ही उसे कुल मतों का बहुमत न मिले। भारत में इस व्यवस्था का उपयोग लोकसभा और कई राज्य विधानसभाओं के चुनावों में किया जाता है। इस व्यवस्था का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने के लिए, इसके लाभ और सीमाओं पर ध्यान देना आवश्यक है।
फर्स्ट पास्ट द पोस्ट व्यवस्था की विशेषताएँ
FPTP व्यवस्था की सीमाएँ
वैकल्पिक प्रणाली
निष्कर्ष
‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ व्यवस्था के भारतीय संदर्भ में एक मिश्रित प्रभाव है। जहां यह प्रणाली चुनावी प्रक्रिया को सरल और स्थिर बनाती है, वहीं इसके द्वारा प्रतिनिधित्व की कमी, रणनीतिक मतदान, और सामाजिक विभाजन की समस्याएँ भी उभरती हैं। इन सीमाओं के मद्देनजर, वैकल्पिक चुनावी प्रणालियों की चर्चा और संभावनाएँ विचारणीय हैं, जो भविष्य में अधिक समावेशी और प्रतिनिधित्वात्मक चुनावी परिदृश्य को प्रोत्साहित कर सकती हैं। UPSC Mains उम्मीदवारों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि विभिन्न चुनावी प्रणालियाँ कैसे काम करती हैं और उनके संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं।
See lessभारत के चुनाव आयोग की स्वतन्त्रता से आप क्या समझते हैं? इसके मार्गदर्शक सिद्धान्त क्या हैं?
भारत के चुनाव आयोग की स्वतंत्रता भारत के चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से मुझे यह मान्यता है कि यह निष्पक्षता और निर्भीकता को सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र रूप से कार्य करता है, बिना किसी अंतर्निहित प्रभाव से प्रभावित होने के। चुनाव आयोग की इस स्वतंत्रता के माध्यम से भारतीय लोकतंत्र में मुक्त और न्यायसंRead more
भारत के चुनाव आयोग की स्वतंत्रता
भारत के चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से मुझे यह मान्यता है कि यह निष्पक्षता और निर्भीकता को सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र रूप से कार्य करता है, बिना किसी अंतर्निहित प्रभाव से प्रभावित होने के। चुनाव आयोग की इस स्वतंत्रता के माध्यम से भारतीय लोकतंत्र में मुक्त और न्यायसंगत चुनाव सुनिश्चित किए जाते हैं।
मार्गदर्शक सिद्धान्त
हाल के उदाहरण
इस प्रकार, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मार्गदर्शक सिद्धांतों का पालन करना भारतीय लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
See lessमतदान व्यवहार के अध्ययन का क्या महत्व है?
मतदान व्यवहार के अध्ययन का महत्व मतदान व्यवहार का अध्ययन लोकतंत्र की प्रक्रिया को समझने और शासन को प्रभावी बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है: 1. चुनावी परिणामों की समझ मतदान व्यवहार यह समझने में मदद करता है कि किन कारणों से कुछ उम्मीदवारRead more
मतदान व्यवहार के अध्ययन का महत्व
मतदान व्यवहार का अध्ययन लोकतंत्र की प्रक्रिया को समझने और शासन को प्रभावी बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
1. चुनावी परिणामों की समझ
मतदान व्यवहार यह समझने में मदद करता है कि किन कारणों से कुछ उम्मीदवार या पार्टियाँ चुनाव जीतती हैं या हारती हैं। विभिन्न जनसांख्यिकी, क्षेत्रीय प्रभाव, और राजनीतिक झुकावों का विश्लेषण करके, चुनावी परिणामों की भविष्यवाणी की जा सकती है और राजनीतिक शक्ति के बदलाव को समझा जा सकता है।
उदाहरण: 2024 के भारतीय आम चुनावों में, बीजेपी की उत्तर प्रदेश और बिहार में महत्वपूर्ण जीत का कारण ग्रामीण और जाति आधारित वोटों की प्रभावी सगाई थी। मतदान व्यवहार के अध्ययन से पार्टी की रणनीति और इसके चुनाव परिणामों पर प्रभाव को समझा जा सकता है।
2. राजनीतिक अभियान की रणनीति
मतदान व्यवहार के बारे में जानकारी से राजनीतिक अभियानों की रणनीतियाँ तैयार की जाती हैं। मतदाताओं की प्राथमिकताओं, चिंताओं और अपेक्षाओं को समझकर, राजनीतिक पार्टियाँ अपने संदेश और नीतियों को विशेष मतदाता वर्गों को आकर्षित करने के लिए ढाल सकती हैं।
उदाहरण: 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों में, कांग्रेस पार्टी ने किसानों की समस्याओं और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया। यह रणनीति मतदाताओं के व्यवहार के विश्लेषण पर आधारित थी और राज्य में उनकी सफलता में योगदान दिया।
3. नीति निर्माण को सशक्त बनाना
मतदान व्यवहार से प्राप्त जानकारी का उपयोग नीतियों को ऐसा बनाने में किया जाता है जो मतदाताओं की अपेक्षाओं और चिंताओं के अनुरूप हो। यह नीतियों की प्रभावशीलता और लोकप्रियता को बढ़ाता है।
उदाहरण: 2023 के अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में, हेल्थकेयर और महंगाई पर जोर दिया गया। यह डेमोक्रेटिक पार्टी की प्राथमिकताएँ थीं जो मतदाताओं की व्यापक चिंताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार की गईं।
4. चुनावी पारदर्शिता को सुनिश्चित करना
मतदान व्यवहार का अध्ययन चुनावी अनियमितताओं या धोखाधड़ी की पहचान में सहायक होता है। इससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और ईमानदारी को सुनिश्चित किया जा सकता है।
उदाहरण: 2024 के जिम्बाब्वे चुनावों में, असामान्य मतदान पैटर्न और मतदाता पंजीकरण में असंगतताओं की जांच के परिणामस्वरूप चुनावी निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उपाय किए गए।
5. लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ावा देना
मतदान व्यवहार का अध्ययन मतदाता भागीदारी में बाधाओं को उजागर कर सकता है और लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ावा देने के प्रयासों को सूचित कर सकता है। इसमें मतदाता उदासीनता, वंचना और मतदान तक असमान पहुँच जैसी समस्याओं को संबोधित किया जाता है।
उदाहरण: 2023 के नाइजीरियाई आम चुनावों में, ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाता टर्नआउट बढ़ाने के प्रयास मतदान व्यवहार के अध्ययन से प्रभावित हुए। मतदाता शिक्षा और सुलभ मतदान केंद्रों जैसे उपाय किए गए।
6. शैक्षणिक और व्यावहारिक अंतर्दृष्टियाँ प्रदान करना
मतदान व्यवहार का अध्ययन राजनीतिक विज्ञान और समाजशास्त्र में शैक्षणिक शोध को योगदान करता है और दोनों शोधकर्ताओं और व्यावसायिक प्रथाओं के लिए व्यावहारिक अंतर्दृष्टियाँ प्रदान करता है। यह राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व से संबंधित सिद्धांतों को विकसित करने में मदद करता है।
उदाहरण: 2024 के यूरोपीय संसद चुनावों पर हालिया अध्ययन ने युवाओं के मतदान व्यवहार में जलवायु परिवर्तन और डिजिटल अधिकारों पर बदलती राय को उजागर किया, जिससे शैक्षणिक चर्चाएँ और राजनीतिक रणनीतियाँ प्रभावित हुईं।
सारांश में, मतदान व्यवहार का अध्ययन चुनावी गतिशीलता को समझने, प्रभावी अभियान और नीतियाँ तैयार करने, चुनावी पारदर्शिता सुनिश्चित करने, और लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से, सभी पक्षों को लोकतांत्रिक प्रणालियों की कार्यक्षमता और वैधता को बढ़ाने में सहायता मिलती है।
See lessचुनाव के समय मीडिया की क्या भूमिका होती है?
चुनाव के समय मीडिया की भूमिका चुनाव के दौरान मीडिया का एक महत्वपूर्ण और बहुपरकारीक भूमिका होती है, जो लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करती है और चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शिता और प्रभावी बनाती है। यहां मीडिया की प्रमुख भूमिकाओं की चर्चा की गई है, साथ ही हाल के उदाहरण भी प्रस्तुत किए गए हैं। 1. जनसंचार औरRead more
चुनाव के समय मीडिया की भूमिका
चुनाव के दौरान मीडिया का एक महत्वपूर्ण और बहुपरकारीक भूमिका होती है, जो लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करती है और चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शिता और प्रभावी बनाती है। यहां मीडिया की प्रमुख भूमिकाओं की चर्चा की गई है, साथ ही हाल के उदाहरण भी प्रस्तुत किए गए हैं।
1. जनसंचार और सूचना प्रदान करना
मीडिया चुनाव के दौरान उम्मीदवारों, उनकी नीतियों और प्रमुख मुद्दों पर जानकारी प्रदान करती है, जिससे मतदाता सूचित निर्णय ले सकें।
2. बहस और चर्चा को प्रोत्साहित करना
मीडिया मंच प्रदान करती है जहां उम्मीदवार अपनी नीतियों पर चर्चा कर सकते हैं और जनता उनके विचारों पर सवाल उठा सकती है। यह प्रक्रिया चुनावी चर्चा को जीवंत और इंटरैक्टिव बनाती है।
3. चुनावी प्रक्रिया की निगरानी और रिपोर्टिंग
मीडिया चुनावी प्रक्रिया की निगरानी करती है और किसी भी अनियमितता, धोखाधड़ी या चुनावी कानूनों के उल्लंघन की रिपोर्ट करती है। इससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित होता है।
4. मतदाता जागरूकता और भागीदारी को बढ़ावा देना
मीडिया अभियानों और जनसंपर्क विज्ञापनों के माध्यम से मतदाता जागरूकता बढ़ाती है और उच्च मतदान दर को प्रोत्साहित करती है। इसमें मतदाता पंजीकरण, मतदान स्थल, और मतदान के महत्व की जानकारी शामिल होती है।
5. विविध आवाजों को प्लेटफार्म प्रदान करना
मीडिया यह सुनिश्चित करती है कि विभिन्न राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और नागरिक समाज समूहों को अपनी आवाज़ उठाने का मौका मिले। यह विविधता चुनावी चर्चा को अधिक समावेशी और प्रतिनिधि बनाती है।
6. गलत सूचना और फर्जी खबरों का मुकाबला
डिजिटल युग में, मीडिया गलत सूचना और फर्जी खबरों का मुकाबला करने के लिए जिम्मेदार होती है, जो सार्वजनिक धारणा को प्रभावित कर सकती है। इसमें तथ्य-जांच और सही जानकारी प्रदान करना शामिल है।
निष्कर्ष
चुनाव के समय मीडिया की भूमिका लोकतंत्र को मज़बूती प्रदान करने में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। जनसंचार, बहस की सुविधा, प्रक्रिया की निगरानी, और गलत सूचनाओं का मुकाबला करने के माध्यम से, मीडिया एक सूचित और सक्रिय मतदाता आधार सुनिश्चित करती है और चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी और प्रभावी बनाती है।
See lessजन-प्रतिनिधित्व कानून के मुख्य तत्वों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (125 Words) [UPPSC 2019]
जन-प्रतिनिधित्व कानून के मुख्य तत्वों का आलोचनात्मक परीक्षण **1. चुनावी प्रक्रिया का नियमन जन-प्रतिनिधित्व कानून (1951 & 1952) चुनावी प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। यह चुनावों, उम्मीदवार की पात्रता, और मतदाता अधिकारों की प्रक्रियाओं को स्पष्ट करता है। हाल ही में, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVMs)Read more
जन-प्रतिनिधित्व कानून के मुख्य तत्वों का आलोचनात्मक परीक्षण
**1. चुनावी प्रक्रिया का नियमन
जन-प्रतिनिधित्व कानून (1951 & 1952) चुनावी प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। यह चुनावों, उम्मीदवार की पात्रता, और मतदाता अधिकारों की प्रक्रियाओं को स्पष्ट करता है। हाल ही में, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVMs) और वोटर वेरिफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) पर चुनाव आयोग के दिशा-निर्देश इसके निष्पक्षता को बढ़ाते हैं।
**2. पात्रता और अयोग्यता
कानून उम्मीदवारों के पात्रता मानदंड और अयोग्यता की स्थितियाँ निर्धारित करता है, जैसे आपराधिक सजा और विफलता। 2021 में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आपराधिक रिकॉर्ड के खुलासे पर इसका उदाहरण है।
**3. चुनावी अपराध
यह चुनावी अपराधों जैसे भ्रष्टाचार, डराना-धमकाना, और घूस को संबोधित करता है। हाल के चुनावों में धन और बल के दुरुपयोग के खिलाफ की गई कार्रवाई इस तत्व की प्रासंगिकता को दर्शाती है।
**4. सुधार और चुनौतियाँ
कानून के बावजूद, अधिकारों की अमलविज्ञता और पारदर्शिता की कमी जैसी समस्याएँ मौजूद हैं। हाल में ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण के प्रस्ताव जैसे सुधार इन चुनौतियों को संबोधित करने के प्रयास हैं।
सारांश में, जन-प्रतिनिधित्व कानून चुनावी व्यवस्था के लिए एक मजबूत ढांचा प्रदान करता है, लेकिन सुधार और पारदर्शिता की निरंतर आवश्यकता है।
See lessकैदियों को मताधिकार से वंचित करना वस्तुतः लोकतंत्र के एक प्रशंसनीय मूल्य, अर्थात् "मतदान के अधिकार का अपमान करना है, जिसकी गंभीरतापूर्वक रक्षा की जानी चाहिए। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के आलोक में चर्चा कीजिए। (250 words)
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के आलोक में कैदियों को मताधिकार से वंचित करना लोकतंत्र के मूल्यों और अधिकारों के प्रति एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 भारत में चुनावों के आयोजन और चुनावी प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाला मुख्य कानून है। यह अधिनियम मतदाता योग्यता, चुनावी नियमोंRead more
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के आलोक में कैदियों को मताधिकार से वंचित करना लोकतंत्र के मूल्यों और अधिकारों के प्रति एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 भारत में चुनावों के आयोजन और चुनावी प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाला मुख्य कानून है। यह अधिनियम मतदाता योग्यता, चुनावी नियमों और लोक प्रतिनिधियों की नियुक्ति को निर्धारित करता है।
कैदियों के मताधिकार का प्रश्न:
डेमोक्रेटिक सिद्धांत: लोकतंत्र में मतदान का अधिकार प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है, जिसे संविधान और चुनावी कानूनों के माध्यम से संरक्षित किया गया है। कैदियों को मताधिकार से वंचित करना, जो कि उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर रखता है, लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकता है।
मानवाधिकार और पुनर्वास: कैदी भी समाज के सदस्य होते हैं और उनके अधिकारों का सम्मान करना आवश्यक है। मताधिकार से वंचित करना पुनर्वास की प्रक्रिया को प्रभावित करता है और समाज की मुख्यधारा में उनकी पुनः स्थापना के प्रयासों को कमजोर करता है।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951: इस अधिनियम में कैदियों के मतदान के अधिकार को सीधे तौर पर संबोधित नहीं किया गया है, परंतु इसमें नागरिकों के मतदान के अधिकारों को मान्यता दी गई है। भारतीय संविधान के तहत, कैदियों को मतदान से वंचित करने की प्रथा एक विवादित मामला है। विभिन्न न्यायालयों ने इस मुद्दे पर विभिन्न विचार व्यक्त किए हैं, जिसमें कहा गया है कि कैदियों को मतदान के अधिकार से वंचित करना उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।
निष्कर्ष:
See lessकैदियों को मताधिकार से वंचित करना लोकतंत्र के मूल्य और मानवाधिकारों के प्रति एक चुनौतीपूर्ण सवाल है। यह सुनिश्चित करना कि सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जाए, लोकतांत्रिक समाज की ताकत और न्याय के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इस संदर्भ में, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम और अन्य कानूनी ढाँचों का समीक्षा और सुधार महत्वपूर्ण हो सकता है।
निर्धनता और भूख से जुड़े मुद्दे भारत की चुनावी राजनीति को किस प्रकार प्रभावित करते हैं? (125 Words) [UPPSC 2021]
निर्धनता और भूख का चुनावी राजनीति पर प्रभाव चुनावी वादे: निर्धनता और भूख प्रमुख चुनावी मुद्दे बनते हैं। राजनीतिक पार्टियाँ वोट बटोरने के लिए सबसिडी, वेलफेयर स्कीम्स, और भ्रष्टाचार विरोधी वादे करती हैं, जैसे राशन कार्ड, नौकरियों और आर्थिक सहायता के प्रलोभन। मतदाता आकर्षण: गरीब और भूखे वर्ग को लक्षितRead more
निर्धनता और भूख का चुनावी राजनीति पर प्रभाव
चुनावी वादे: निर्धनता और भूख प्रमुख चुनावी मुद्दे बनते हैं। राजनीतिक पार्टियाँ वोट बटोरने के लिए सबसिडी, वेलफेयर स्कीम्स, और भ्रष्टाचार विरोधी वादे करती हैं, जैसे राशन कार्ड, नौकरियों और आर्थिक सहायता के प्रलोभन।
मतदाता आकर्षण: गरीब और भूखे वर्ग को लक्षित कर मतदाता आधार को बढ़ाने की कोशिश की जाती है। चुनावों के समय आकर्षक पैकेज और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के वादे होते हैं।
वोट बैंक राजनीति: इन मुद्दों का राजनीतिक दुरुपयोग होता है। पार्टियाँ अक्सर अल्पकालिक समाधान प्रदान करती हैं, जिससे दीर्घकालिक नीति पर ध्यान कम होता है।
निष्कर्ष: निर्धनता और भूख चुनावी राजनीति को वोट बैंक राजनीति, पॉपुलिस्ट वादे और अल्पकालिक उपायों के माध्यम से प्रभावित करते हैं।
See lessइलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ई० वी० एम०) के इस्तेमाल संबंधी हाल के विवाद के आलोक में, भारत में चुनावों की विश्वास्यता सुनिश्चित करने के लिए भारत के निर्वाचन आयोग के समक्ष क्या-क्या चुनौतियाँ हैं? (150 words) [UPSC 2018]
भारत में चुनावों की विश्वास्यता और ईवीएम विवाद चुनौतियाँ: ईवीएम पर संदेह: हाल के विवादों में ईवीएम की सुरक्षा और सटीकता पर सवाल उठाए गए हैं। इससे चुनाव परिणामों की विश्वास्यता प्रभावित हो सकती है। भारत के निर्वाचन आयोग को इन तकनीकी समस्याओं को सुलझाने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। सार्वजनिक वRead more
भारत में चुनावों की विश्वास्यता और ईवीएम विवाद
चुनौतियाँ:
निष्कर्ष: भारत के निर्वाचन आयोग को ईवीएम के विवादों को सुलझाने के लिए तकनीकी और प्रशासनिक उपायों को लागू करना होगा, ताकि चुनावों की विश्वास्यता और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।
See lessकिन आधारों पर किसी लोक प्रतिनिधि को, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अधीन निरर्हित किया जा सकता है ? उन उपचारों का भी उल्लेख कीजिए जो ऐसे निरर्हित व्यक्ति को अपनी निरर्हता के विरुद्ध उपलब्ध हैं। (250 words) [UPSC 2019]
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत किसी लोक प्रतिनिधि को निरर्हित करने के आधार निम्नलिखित हैं: 1. अपराध और सजा: यदि कोई लोक प्रतिनिधि किसी गंभीर अपराध जैसे कि भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, या हिंसात्मक अपराध में दोषी पाया जाता है और उसे दो वर्ष या उससे अधिक की सजा मिलती है, तो उसे निरर्हित किया जा सकता हRead more
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत किसी लोक प्रतिनिधि को निरर्हित करने के आधार निम्नलिखित हैं:
1. अपराध और सजा:
यदि कोई लोक प्रतिनिधि किसी गंभीर अपराध जैसे कि भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, या हिंसात्मक अपराध में दोषी पाया जाता है और उसे दो वर्ष या उससे अधिक की सजा मिलती है, तो उसे निरर्हित किया जा सकता है।
2. आय और संपत्ति की जानकारी में असत्यापन:
यदि लोक प्रतिनिधि अपनी आय और संपत्ति की जानकारी प्रस्तुत करने में असफल रहता है या गलत जानकारी देता है, तो उसे निरर्हित किया जा सकता है।
3. निर्वाचन आयोग के नियमों का उल्लंघन:
यदि कोई प्रतिनिधि निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित नियमों और आचार संहिता का उल्लंघन करता है, तो उसे निरर्हित किया जा सकता है।
4. सदस्यता की अवमानना:
संसद या विधानमंडल की कार्यवाही में शामिल न होने या अनुपस्थित रहने के मामले में भी निरर्हता लगाई जा सकती है, यदि अनुपस्थिति की अवधि आवश्यक मानदंडों से अधिक हो।
उपचार:
1. अपील:
निरर्हता की स्थिति में व्यक्ति के पास उच्च न्यायालय में अपील करने का विकल्प होता है। व्यक्ति निरर्हता के आदेश को चुनौती देने के लिए कानूनी अपील कर सकता है।
2. पुनर्विचार याचिका:
विधानसभा या संसद के विशेष मामलों में, निरर्हता के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की जा सकती है।
3. दूसरी बार चुनाव:
निर्णायक निरर्हता के बाद, व्यक्ति अगले चुनाव में पुनः चुनाव के लिए खड़ा हो सकता है, यदि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं हुए या उसने सजा का पालन कर लिया है।
इन उपचारों के माध्यम से निरर्हित व्यक्ति को अपनी निरर्हता के खिलाफ कानूनी उपाय उपलब्ध होते हैं।
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