उत्तर लिखने के लिए रोडमैप परिचय असहयोग आंदोलन 1920-22 में महात्मा गांधी द्वारा नेतृत्व किया गया था, जिसका उद्देश्य भारतीय स्वतंत्रता को अहिंसक तरीकों से प्राप्त करना था। लेकिन गांधीजी द्वारा अचानक आंदोलन को वापस लिए जाने के बाद कई क्रांतिकारी समूहों ...
मॉडल उत्तर आरबीआई के मौद्रिक नीति के साधन मौद्रिक नीति केंद्रीय बैंक द्वारा मुद्रा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने हेतु बनाए गए नियमों और साधनों को संदर्भित करती है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) निम्नलिखित साधनों का उपयोग करता है- 1. परिमाणात्मक साधन विधिक आरक्षित अनुपात (SLR और CRR): वाणिजRead more
मॉडल उत्तर
आरबीआई के मौद्रिक नीति के साधन
मौद्रिक नीति केंद्रीय बैंक द्वारा मुद्रा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने हेतु बनाए गए नियमों और साधनों को संदर्भित करती है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) निम्नलिखित साधनों का उपयोग करता है-
1. परिमाणात्मक साधन
- विधिक आरक्षित अनुपात (SLR और CRR):
वाणिज्यिक बैंकों को अपनी कुल जमा राशि का एक निश्चित प्रतिशत आरबीआई के पास नकद या प्रतिभूतियों के रूप में रखना होता है। - रेपो और रिवर्स रेपो दर:
रेपो दर वह दर है जिस पर बैंक आरबीआई से अल्पकालिक उधारी लेते हैं। रिवर्स रेपो के तहत बैंक अपनी अधिशेष नकदी आरबीआई को ब्याज के लिए देते हैं। - खुला बाजार परिचालन (OMO):
सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री और खरीद के जरिए आरबीआई बाजार में तरलता नियंत्रित करता है। - बाजार स्थिरीकरण योजना (MSS):
इसमें ट्रेजरी बिल और सरकारी प्रतिभूतियों का उपयोग कर अधिशेष मुद्रा को अवशोषित किया जाता है।
2. गुणात्मक साधन
- शाख की राशनिंग:
चुनिंदा क्षेत्रों में ऋण आपूर्ति सीमित करना। - नैतिक सलाह:
मुद्रास्फीति या संकट के समय आरबीआई बैंकिंग संस्थानों को मार्गदर्शन प्रदान करता है।
आरबीआई की बैंकर के रूप में भूमिका
वाणिज्यिक बैंकों के लिए बैंकर:
- आरबीआई नकदी की कमी होने पर बैंकों को फंड उपलब्ध कराता है।
- चलनिधि समायोजन सुविधा (LAF) और सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) जैसे तंत्र के जरिए बैंकों को वित्तीय सहायता दी जाती है।
सरकार के लिए बैंकर
- आरबीआई भारत सरकार और सभी राज्यों (सिक्किम को छोड़कर) के लिए बैंकर और ऋण प्रबंधक का कार्य करता है।
- सरकारी ऋण जारी करना, उनका प्रबंधन करना, और सरकार को अल्पकालिक ऋण प्रदान करना आरबीआई के दायित्व हैं।
निष्कर्ष
आरबीआई न केवल आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए विभिन्न मौद्रिक साधनों का उपयोग करता है बल्कि वाणिज्यिक बैंकों और सरकार के वित्तीय प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभाता है। इससे देश की वित्तीय प्रणाली सुचारू रूप से कार्य करती है।
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मॉडल उत्तर असहयोग आंदोलन (1920-22) के असफल होने के बाद भारत में क्रांतिकारी गतिविधियाँ फिर से उभरीं। गांधीजी के अहिंसक आंदोलन को वापस लिए जाने के बाद, कई युवा राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी आंदोलनों की ओर आकर्षित हुए। विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों ने क्रांतिकारी गतिविधियों कोRead more
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असहयोग आंदोलन (1920-22) के असफल होने के बाद भारत में क्रांतिकारी गतिविधियाँ फिर से उभरीं। गांधीजी के अहिंसक आंदोलन को वापस लिए जाने के बाद, कई युवा राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी आंदोलनों की ओर आकर्षित हुए। विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों ने क्रांतिकारी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया, जिससे भारत में स्वतंत्रता संग्राम के एक नए रूप की शुरुआत हुई।
1. असहयोग आंदोलन का अचानक समापन (Sudden Withdrawal of the Non-Cooperation Movement)
असहयोग आंदोलन को अचानक समाप्त करने से कई क्रांतिकारियों का विश्वास टूट गया। यह आंदोलन सफल नहीं हो सका, और इसके नेतृत्व ने अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना शुरू कर दिया। इससे क्रांतिकारी विचारधारा को बढ़ावा मिला, क्योंकि अब युवा नेताओं को अहिंसा से अधिक हिंसक संघर्ष का मार्ग दिखा।
2. युवा राष्ट्रवादियों की असंतुष्टि (Dissatisfaction of Young Nationalists)
कई युवा राष्ट्रवादी स्वराजवादियों और अपरिवर्तनकारियों के संसद में काम करने से संतुष्ट नहीं थे। वे यह मानते थे कि केवल हिंसक तरीके ही भारत को स्वतंत्र करा सकते हैं। इसने क्रांतिकारी गतिविधियों को पुनः सक्रिय किया और हिंसा के माध्यम से स्वतंत्रता की दिशा में कदम बढ़ाए गए।
3. मजदूर वर्ग और ट्रेड यूनियन का उभार (Rise of Labor Movements and Trade Unions)
प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में मजदूर वर्ग का आन्दोलित होना और ट्रेड यूनियनवाद का उभार हुआ, जिससे क्रांतिकारी गतिविधियों को एक नई दिशा मिली। कई क्रांतिकारी नेता अब इन नए वर्गों को जोड़कर आंदोलन को और तेज़ करने के लिए प्रेरित हुए।
4. रूसी क्रांति का प्रभाव (Impact of the Russian Revolution)
रूसी क्रांति (1917) ने वैश्विक स्तर पर समाजवाद और मार्क्सवाद के सिद्धांतों को प्रोत्साहित किया। इसने भारत में उभरते हुए साम्यवादी समूहों को प्रभावित किया और क्रांतिकारी गतिविधियों में तेजी लाई। युवा सोवियत राज्य की सफलता ने भारत में क्रांतिकारी समूहों को एक नई दिशा दी।
5. क्रांतिकारी साहित्य का प्रसार (Spread of Revolutionary Literature)
साहित्य और पत्रकारिता का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा, जिसमें आत्म-बलिदान और क्रांतिकारी कार्यों की प्रशंसा की जाती थी। पत्रिकाएँ जैसे “आत्मशक्ति”, “सारथी” और शरत चंद्र चटर्जी की “पाथेर दाबी” ने युवाओं को प्रेरित किया और उन्हें क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने के लिए उत्साहित किया।
6. व्यक्तिगत वीरता और सामूहिक कार्रवाई (Individual Heroism and Collective Action)
क्रांतिकारी गतिविधियों का एक प्रमुख पहलू यह था कि व्यक्तिगत वीरता को बढ़ावा दिया गया। इसके साथ ही, सामूहिक कार्रवाई पर भी जोर दिया गया, जहां औपनिवेशिक राज्य के अंगों को लक्षित कर युवाओं को एक उदाहरण प्रस्तुत किया गया।
7. नए क्रांतिकारी समूहों का गठन (Formation of New Revolutionary Groups)
असहयोग आंदोलन के बाद, कई नए क्रांतिकारी समूहों का गठन हुआ। इन समूहों ने भूमिगत गतिविधियों को तेज़ किया और सरकारी दमन के बावजूद अपने आंदोलनों को जारी रखा। सूर्य सेन का चटगांव समूह एक प्रमुख उदाहरण है।
निष्कर्ष (Conclusion)
असहयोग आंदोलन के बाद क्रांतिकारी गतिविधियों के उभरने के पीछे कई कारक थे, जैसे गांधीजी द्वारा आंदोलन की वापसी, युवा राष्ट्रवादियों का असंतोष, मजदूर वर्ग का उभार, रूसी क्रांति का प्रभाव और क्रांतिकारी साहित्य का प्रसार। इन सभी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक नए, अधिक उग्र और हिंसक दिशा में क्रांतिकारी गतिविधियों को प्रेरित किया।
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