उत्तर लेखन के लिए रोडमैप 1. प्रस्तावना संविधान की भूमिका: अनुच्छेद 355 और 356 का महत्व। संघीय ढांचे का संदर्भ: भारत में संघीय ढांचे का परिचय। 2. अनुच्छेद 355 और 356 का विवरण अनुच्छेद 355: संघ सरकार की जिम्मेदारी। अनुच्छेद 356: राष्ट्रपति शासन का प्रावधान और ...
मॉडल उत्तर प्रस्तावना भारत में विकासात्मक आकांक्षाएँ तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन यह आवश्यक है कि इन्हें पर्यावरणीय स्थिरता के साथ संतुलित किया जाए। हाल ही में शुरू की गई केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना इस संतुलन का एक प्रमुख उदाहरण है, जो विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच के टकराव को उजागर करती है। प्रमुRead more
मॉडल उत्तर
प्रस्तावना
भारत में विकासात्मक आकांक्षाएँ तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन यह आवश्यक है कि इन्हें पर्यावरणीय स्थिरता के साथ संतुलित किया जाए। हाल ही में शुरू की गई केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना इस संतुलन का एक प्रमुख उदाहरण है, जो विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच के टकराव को उजागर करती है।
प्रमुख चुनौतियाँ
- निर्वनीकरण और आवास की क्षति: तेजी से हो रहे शहरीकरण और बुनियादी ढाँचे के विकास से पारिस्थितिकी संतुलन पर असर पड़ रहा है। FAO के अनुसार, भारत में 2015 से 2020 के बीच 668 हेक्टेयर प्रति वर्ष की दर से वनों की कटाई हुई है।
- जल तनाव: भारत के 70-80% किसान भूजल पर निर्भर हैं, जिससे जल स्तर में चिंताजनक कमी आई है। NITI आयोग के अनुसार, 600 मिलियन भारतीय जल संकट का सामना कर रहे हैं।
- वायु प्रदूषण: औद्योगिक विकास के परिणामस्वरूप वायु गुणवत्ता में गिरावट आई है। 2023 में, भारत के 50 सबसे प्रदूषित शहरों में से 39 थे, जिसमें दिल्ली और कानपुर शामिल हैं।
- भूमि क्षरण: असंवहनीय कृषि प्रथाओं और वनों की कटाई के कारण लगभग 30% भूमि प्रभावित है।
- जलवायु परिवर्तन: 2023 में भारत का ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 6.1% बढ़ गया, जो वैश्विक कुल का 8% है।
रणनीतियाँ
- नवीकरणीय ऊर्जा में परिवर्तन: भारत को हरित ऊर्जा स्रोतों को अपनाने की आवश्यकता है। ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और सौर ऊर्जा के विस्तार जैसे कदम इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं।
- संधारणीय शहरीकरण: शहरी नियोजन में हरित बुनियादी ढाँचे का विकास और शून्य-अपशिष्ट नीतियाँ अपनाई जानी चाहिए।
- वन संरक्षण: सामुदायिक वनरोपण और कृषि वानिकी को बढ़ावा देकर जैव विविधता और आजीविका को सुरक्षित किया जा सकता है।
- जल संसाधन प्रबंधन: वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण, और जलभृत पुनर्भरण को एकीकृत करना आवश्यक है।
- परिवहन का विद्युतीकरण: इलेक्ट्रिक वाहनों और हाइड्रोजन ईंधन-सेल वाहनों को प्रोत्साहित करना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत की विकासात्मक आकांक्षाओं को पर्यावरणीय स्थिरता के साथ संतुलित करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है। केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना जैसे उदाहरणों से हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी अनिवार्य है, जिससे हम सतत विकास लक्ष्यों [Sustainable Development Goals (SDGs)] की दिशा में आगे बढ़ सकें।
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मॉडल उत्तर प्रस्तावना भारत का संविधान एक संघीय ढांचे पर आधारित है, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण किया गया है। अनुच्छेद 355 और 356 इस ढांचे के महत्वपूर्ण पहलू हैं, जो शासन की स्थिरता सुनिश्चित करने के साथ-साथ संघीयता की रक्षा में भी सहायक हैं। अनुच्छेद 355 और 356 का विवरण अनुच्छेदRead more
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प्रस्तावना
भारत का संविधान एक संघीय ढांचे पर आधारित है, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण किया गया है। अनुच्छेद 355 और 356 इस ढांचे के महत्वपूर्ण पहलू हैं, जो शासन की स्थिरता सुनिश्चित करने के साथ-साथ संघीयता की रक्षा में भी सहायक हैं।
अनुच्छेद 355 और 356 का विवरण
अनुच्छेद 355 के अनुसार, संघ सरकार की जिम्मेदारी है कि वह प्रत्येक राज्य को बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से बचाए। वहीं, अनुच्छेद 356 राष्ट्रपति शासन का प्रावधान करता है, जो राष्ट्रपति को राज्य प्रशासन संभालने की अनुमति देता है जब राज्य सरकार संविधान के अनुसार कार्य नहीं करती।
अनुच्छेदों के निहितार्थ
इन अनुच्छेदों के माध्यम से केंद्र सरकार को राज्य प्रशासन में हस्तक्षेप करने की शक्ति मिलती है, जिससे राजनीतिक स्थिरता बनी रह सकती है। हालाँकि, इससे केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव भी उत्पन्न हो सकता है।
दुरुपयोग की चिंताएँ
राष्ट्रपति शासन का दुरुपयोग राजनीतिक कारणों से विपक्षी सरकारों को बर्खास्त करने के लिए किया गया है। जैसे, 1966-1977 के बीच 48 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया। ‘संवैधानिक मशीनरी की विफलता’ की अस्पष्ट परिभाषा भी केंद्र के दुरुपयोग को बढ़ावा देती है।
दुरुपयोग को रोकने के उपाय
दुरुपयोग को रोकने के लिए:
आगे की राह
संविधान के अनुच्छेद 355 और 356 का उद्देश्य संघीयता को बनाए रखते हुए शासन की स्थिरता सुनिश्चित करना है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर की आशा थी कि राष्ट्रपति शासन एक ‘मृत पत्र’ बनेगा, इसका प्रयोग केवल असाधारण स्थितियों में होना चाहिए। एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाकर ही हम संघीय संतुलन और स्थिरता को सुनिश्चित कर सकते हैं।
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