पिछली शताब्दी के तीसरे दशक से भारतीय स्वतंत्रता की स्वप्न दृष्टि के साथ सम्बद्ध हो गए नए उद्देश्यों के महत्त्व को उजागर कीजिए। (250 words) [UPSC 2017]
1930-34 का सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण और बहुपरकारी चरण था। इस आंदोलन की अद्वितीय विशेषता उसकी व्यापकता, क्षेत्रीय विविधता और नवीन लामबंदी के तरीकों में निहित है। अद्वितीय विशेषता: इस आंदोलन की मुख्य विशेषता इसका शांतिपूर्ण प्रतिरोध थाRead more
1930-34 का सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण और बहुपरकारी चरण था। इस आंदोलन की अद्वितीय विशेषता उसकी व्यापकता, क्षेत्रीय विविधता और नवीन लामबंदी के तरीकों में निहित है।
अद्वितीय विशेषता: इस आंदोलन की मुख्य विशेषता इसका शांतिपूर्ण प्रतिरोध था, जिसमें ब्रिटिश शासन की अवैध नीतियों के खिलाफ सीधी अवज्ञा की गई। महात्मा गांधी ने इस आंदोलन के अंतर्गत ब्रिटिश शासित कानूनों और नियमों को जानबूझकर न मानने की नीति अपनाई, जो आम लोगों को प्रेरित करने और जन जागरूकता बढ़ाने के लिए एक शक्तिशाली साधन साबित हुई।
क्षेत्रीय स्थानिक पैटर्न: इस आंदोलन ने पूरे भारत में विविध क्षेत्रीय विशेषताओं को उजागर किया। उदाहरण के लिए, गांधीजी ने 1930 में दांडी यात्रा की, जो नमक कानून का उल्लंघन करने का प्रतीकात्मक विरोध था और इसने समूचे देश में सविनय अवज्ञा की लहर को जन्म दिया। इसी प्रकार, कर्नाटका, बंगाल, और पंजाब में भी स्थानीय नेतृत्व और संघर्षों ने आंदोलन को एक व्यापक पैमाने पर फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लामबंदी के नए तरीके: सविनय अवज्ञा आंदोलन में गांधीजी ने नए और प्रभावी लामबंदी के तरीके अपनाए। जनसहयोग और सामाजिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया। आंदोलन में स्थानीय नेतृत्व को बढ़ावा दिया गया और नागरिकों को स्थानीय स्तर पर समस्याओं के समाधान में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया गया। इसके अलावा, महिलाओं और किसानों को भी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए लामबंद किया गया।
इन विशेषताओं के माध्यम से, सविनय अवज्ञा आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा दी और सामूहिक आंदोलन की शक्ति को सिद्ध किया। यह आंदोलन न केवल ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ जन आंदोलन का एक प्रेरणादायक उदाहरण था, बल्कि इसने भारतीय समाज को राजनीतिक सक्रियता और सामाजिक न्याय की दिशा में भी जागरूक किया।
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पिछली शताब्दी के तीसरे दशक के नए उद्देश्यों की महत्ता पिछली शताब्दी के तीसरे दशक (1930-1940) में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक नया मोड़ आया, जिसमें नए उद्देश्यों और दृष्टिकोणों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन नए उद्देश्यों ने स्वतंत्रता संग्राम को न केवल एक नई दिशा दी, बल्कि इसे व्यापक और प्रभावशालRead more
पिछली शताब्दी के तीसरे दशक के नए उद्देश्यों की महत्ता
पिछली शताब्दी के तीसरे दशक (1930-1940) में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक नया मोड़ आया, जिसमें नए उद्देश्यों और दृष्टिकोणों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन नए उद्देश्यों ने स्वतंत्रता संग्राम को न केवल एक नई दिशा दी, बल्कि इसे व्यापक और प्रभावशाली बना दिया।
**1. नवीन दृष्टिकोण और आंदोलन
1930 में महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह के माध्यम से अंग्रेजी सरकार के खिलाफ व्यापक जन आंदोलन शुरू किया। यह आंदोलन सविनय अवज्ञा आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, जिसने जनसाधारण को सीधे संघर्ष में शामिल किया। इस प्रकार, गांधीजी ने स्वतंत्रता संग्राम को केवल एक राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक आंदोलन भी बना दिया।
**2. आर्थिक स्वतंत्रता की दिशा
1930 के दशक में गांधीजी ने स्वदेशी वस्त्र और स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देने पर जोर दिया। इससे भारतीय जनता की आर्थिक आत्मनिर्भरता के प्रति जागरूकता बढ़ी और औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के खिलाफ एक महत्वपूर्ण संघर्ष छेड़ा गया। हाल ही में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत अभियान का उद्देश्य भी इसी सोच को आगे बढ़ाता है, जिससे देश की आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलता है।
**3. राजनीतिक गोलबंदी और समाज सुधार
1935 का भारत सरकार अधिनियम और असंतोष की प्रवृत्तियाँ ने भारतीय राजनीति में नए लक्ष्य और दृष्टिकोण पेश किए। विशेष रूप से, इस दशक में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच विभाजन और अलगाववादी आंदोलन ने भारतीय राजनीति को प्रभावित किया। यह समय भारतीय समाज में एक नए राजनीतिक चिह्न और दिशा की ओर संकेत करता है, जो आज भी विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में देखा जा सकता है।
**4. नये नेतृत्व की उपस्थिति
इस समय ने नेहरूवादी विकास दृष्टिकोण और सामाजिक न्याय के महत्व को उजागर किया, जो स्वतंत्रता संग्राम के बाद स्वतंत्र भारत की नीतियों का आधार बने। जवाहरलाल नेहरू की समाजवादी दृष्टिकोण और औद्योगिकीकरण की योजनाओं ने भारतीय राजनीति में नये उद्देश्यों को स्थापित किया।
इन उद्देश्यों ने स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा और प्रासंगिकता दी, जो आज भी भारतीय राजनीति और समाज में गहराई से विद्यमान है।
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