संवैधानिक नैतिकता’ की जड़ संविधान में ही निहित है और इसके तात्त्विक फलकों पर आधारित है। ‘संवैधानिक नैतिकता’ के सिद्धांत की प्रासंगिक न्यायिक निर्णयों की सहायता से विवेचना कीजिए। (150 words) [UPSC 2021]
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370, जिसका हाशिया नोट "जम्मू-कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में अस्थायी उपबन्ध" है, जम्मू और कश्मीर को विशेष स्वायत्तता प्रदान करता था। इसका उद्देश्य जम्मू और कश्मीर के भारत में विलय की विशिष्ट परिस्थितियों को संबोधित करना था। अस्थायीता की सीमा: प्रारंभिक उद्देश्य: अनुच्छेद 370 कRead more
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370, जिसका हाशिया नोट “जम्मू-कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में अस्थायी उपबन्ध” है, जम्मू और कश्मीर को विशेष स्वायत्तता प्रदान करता था। इसका उद्देश्य जम्मू और कश्मीर के भारत में विलय की विशिष्ट परिस्थितियों को संबोधित करना था।
अस्थायीता की सीमा:
प्रारंभिक उद्देश्य: अनुच्छेद 370 को अस्थायी रूप से स्थापित किया गया था ताकि जम्मू और कश्मीर की विशेष परिस्थितियों के अनुसार एक स्वायत्त व्यवस्था बनाई जा सके। इसके तहत राज्य की अपनी संविधान और अधिकांश प्रशासनिक स्वतंत्रताएँ थीं, जबकि रक्षा, विदेश मामले, और संचार जैसे कुछ विषयों पर केंद्रीय नियंत्रण था।
स्वायत्तता: अनुच्छेद 370 ने जम्मू और कश्मीर को अपने संविधान और विधायिका की स्वतंत्रता प्रदान की, लेकिन यह सीमित था और किसी भी बदलाव के लिए राज्य सरकार की सहमति आवश्यक थी।
उन्मूलन: 2019 में, भारतीय सरकार ने जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के माध्यम से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया। इसके तहत जम्मू और कश्मीर को दो संघीय क्षेत्रों में विभाजित किया गया—जम्मू और कश्मीर, और लद्दाख। इस कदम ने विशेष स्वायत्तता और अनुच्छेद 370 द्वारा प्रदान की गई व्यवस्था को समाप्त कर दिया।
भावी सम्भावनाएँ:
संवैधानिक और राजनीतिक प्रभाव: अनुच्छेद 370 के उन्मूलन से जम्मू और कश्मीर की राज्य-व्यवस्था और राजनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। केंद्रीय नियंत्रण में वृद्धि और नई प्रशासनिक संरचना की शुरुआत ने राज्य के साथ संबंधों में नई दिशा दी है।
क्षेत्रीय और राष्ट्रीय प्रभाव: यह परिवर्तन क्षेत्रीय राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में नई प्राथमिकताएँ और नीतियाँ ला सकता है, जो भारतीय संघीय ढाँचे पर प्रभाव डालेगा।
कानूनी और राजनयिक प्रतिक्रियाएँ: अनुच्छेद 370 के उन्मूलन ने कानूनी और राजनयिक स्तर पर विविध प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न की हैं, जो भारत के आंतरिक और बाहरी संबंधों पर प्रभाव डालेंगी।
सारांश में, अनुच्छेद 370 एक अस्थायी उपबन्ध के रूप में स्थापित था, लेकिन इसके लंबे समय तक प्रभावी रहने के बाद 2019 में इसके उन्मूलन ने जम्मू और कश्मीर के प्रशासनिक और राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं।
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संवैधानिक नैतिकता का सिद्धांत 1. संवैधानिक नैतिकता का अर्थ: 'संवैधानिक नैतिकता' संविधान के मूल्यों और सिद्धांतों की ओर अनुग्रहित दृष्टिकोण को व्यक्त करती है। यह सुनिश्चित करती है कि संविधान के मूलभूत अधिकार और स्वतंत्रताओं का सम्मान किया जाए और संविधान के तात्त्विक मूल्यों को बनाए रखा जाए। 2. न्यायिRead more
संवैधानिक नैतिकता का सिद्धांत
1. संवैधानिक नैतिकता का अर्थ: ‘संवैधानिक नैतिकता’ संविधान के मूल्यों और सिद्धांतों की ओर अनुग्रहित दृष्टिकोण को व्यक्त करती है। यह सुनिश्चित करती है कि संविधान के मूलभूत अधिकार और स्वतंत्रताओं का सम्मान किया जाए और संविधान के तात्त्विक मूल्यों को बनाए रखा जाए।
2. न्यायिक निर्णयों की प्रासंगिकता
के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017): इस निर्णय में, सुप्रीम कोर्ट ने गोपनीयता को मूलभूत अधिकार मानते हुए कहा कि संवैधानिक नैतिकता संविधान के मूल सिद्धांतों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018): कोर्ट ने सहमति से यौन संबंधों को अपराधमुक्त किया, यह बताते हुए कि संवैधानिक नैतिकता समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करती है।
3. निष्कर्ष: संवैधानिक नैतिकता संविधान के मूल सिद्धांतों की सुरक्षा और न्यायिक फैसलों में उनके प्रभाव को सुनिश्चित करती है, जो न्याय और समानता को बढ़ावा देती है।
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