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1920 के दशक से राष्ट्रीय आंदोलन ने कई वैचारिक धाराओं को ग्रहण किया और अपना सामाजिक आधार बढ़ाया। विवेचना कीजिए। (250 words) [UPSC 2020]
1920 के दशक से राष्ट्रीय आंदोलन: वैचारिक विविधता और सामाजिक आधार का विस्तार 1920 के दशक में, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने अपने वैचारिक धारणाओं और सामाजिक आधार को काफी विस्तारित किया। इस अवधि में, आंदोलन ने विभिन्न बौद्धिक धाराओं को अपनाया और समाज के कई वर्गों में अपनी अपील बढ़ाई। कुछ प्रमुख बिंदु और हRead more
1920 के दशक से राष्ट्रीय आंदोलन: वैचारिक विविधता और सामाजिक आधार का विस्तार
1920 के दशक में, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने अपने वैचारिक धारणाओं और सामाजिक आधार को काफी विस्तारित किया। इस अवधि में, आंदोलन ने विभिन्न बौद्धिक धाराओं को अपनाया और समाज के कई वर्गों में अपनी अपील बढ़ाई। कुछ प्रमुख बिंदु और हालिया उदाहरण इस प्रकार हैं:
वैचारिक विविधता:
राष्ट्रीय आंदोलन ने कई वैचारिक दृष्टिकोणों को अपनाया, जिनमें शामिल हैं:
सामाजिक आधार का विस्तार:
1920 के दशक में, राष्ट्रीय आंदोलन ने अपने सामाजिक आधार को काफी बढ़ाया, जिसमें शामिल हैं:
क्षेत्रीय विविधता:
राष्ट्रीय आंदोलन ने क्षेत्रीय स्तर पर भी अलग-अलग अभिव्यक्तियों का विकास किया, जैसे कि संयुक्त प्रांतों में खिलाफत आंदोलन, तमिलनाडु में स्वराज्य आंदोलन और बंगाल में अनुशीलन समिति।
अंतरराष्ट्रीयकरण:
राष्ट्रीय आंदोलन ने वैश्विक विरोधी-औपनिवेशिक और विरोधी-साम्राज्यवादी आंदोलनों के साथ संबंध स्थापित करना शुरू कर दिया, जैसा कि लाला लाजपत राय के संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा और 1931 में आयोजित ऑल एशियन महिला सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधियों की भागीदारी में देखा गया।
संगठनात्मक विकास:
राष्ट्रीय आंदोलन ने राजनीतिक दलों, श्रम संघों और किसान संघठनों जैसी संस्थागत संरचनाओं को मजबूत और विविध किया, जिसने समाज के विभिन्न वर्गों को एकजुट करने और प्रतिनिधित्व करने में मदद की।
संक्षेप में, 1920 का दशक राष्ट्रीय आंदोलन के विकास के एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में उभरा, क्योंकि इसने वैचारिक धाराओं और सामाजिक आधारों की एक व्यापक श्रृंखला को अपनाकर, भारतीय उपमहाद्वीप में अपील और प्रभाव को बढ़ाया।
See less1857 के पूर्व की अवधि में हुए अनेक विद्रोह भारत में ब्रिटिश शासन और उसकी नीतियों के विरुद्ध बढ़ती नाराजगी का संकेत थे। चर्चा कीजिए। (उत्तर 250 शब्दों में दें)
1857 का विद्रोह भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक महत्वपूर्ण घटना थी, लेकिन इसके पूर्व भी अनेक विद्रोह हुए थे जो भारतीय जनता की बढ़ती नाराजगी और असंतोष का संकेत थे। इन विद्रोहों ने 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की थी। 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी के प्रारंभ में भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थाRead more
1857 का विद्रोह भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक महत्वपूर्ण घटना थी, लेकिन इसके पूर्व भी अनेक विद्रोह हुए थे जो भारतीय जनता की बढ़ती नाराजगी और असंतोष का संकेत थे। इन विद्रोहों ने 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की थी।
18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी के प्रारंभ में भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय स्तर पर विद्रोह हुए। इनमें से कुछ प्रमुख विद्रोहों में संन्यासी विद्रोह (1763-1800), पायका विद्रोह (1817), वेल्लोर विद्रोह (1806), और भील विद्रोह (1818-31) शामिल थे। संन्यासी और फकीर विद्रोह बंगाल में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ धार्मिक संप्रदायों द्वारा किया गया। वेल्लोर विद्रोह में भारतीय सिपाहियों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था, जो 1857 के विद्रोह का पूर्वाभास था।
इसके अलावा, आदिवासी विद्रोह जैसे संथाल विद्रोह (1855-56) और भील विद्रोह, स्थानीय जनजातियों द्वारा अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ उठाई गई आवाज़ें थीं। इन विद्रोहों का मुख्य कारण ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीतियां, जैसे भूमि कर में वृद्धि और पारंपरिक समाजिक व्यवस्थाओं का विध्वंस, था।
इन सभी विद्रोहों ने भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों में ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष को प्रकट किया। यद्यपि ये विद्रोह सफल नहीं हो सके, लेकिन उन्होंने 1857 के विद्रोह की नींव रखी और ब्रिटिश शासन के खिलाफ व्यापक जनाक्रोश को प्रकट किया। इस प्रकार, 1857 से पहले के विद्रोहों ने यह स्पष्ट किया कि ब्रिटिश शासन की नीतियों ने भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों में गहरी नाराजगी और असंतोष को जन्म दिया था।
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लॉर्ड कर्जन की नीतियों और राष्ट्रीय आंदोलन पर उनके दूरगामी प्रभाव
लॉर्ड कर्जन की नीतियाँ:
राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव:
हाल के उदाहरण:
निष्कर्ष:
लॉर्ड कर्जन की नीतियाँ भारतीय समाज और राजनीति पर गहरे प्रभाव छोड़ गईं। उनकी शैक्षिक और प्रशासनिक नीतियाँ और विभाजन की नीति ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा दी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरित किया। इन नीतियों ने राजनीतिक जागरूकता, संगठनात्मक शक्ति, और स्वतंत्रता संघर्ष की दिशा को स्पष्ट किया।
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नरमपंथियों की भूमिका और व्यापक स्वतंत्रता आन्दोलन का आधार
नरमपंथियों का उद्देश्य और दृष्टिकोण:
विस्तार और प्रभाव:
विरोध और विफलताएँ:
निष्कर्ष:
नरमपंथियों ने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के आधार को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन उनके दृष्टिकोण की सीमाएँ और क्रांतिकारी प्रतिक्रिया ने इस आन्दोलन को कई मोर्चों पर प्रभावित किया। उनके दृष्टिकोण ने एक संवैधानिक आधार प्रदान किया, जो बाद में क्रांतिकारी और कठोर संघर्ष के साथ मिलकर एक स्वतंत्र भारत के निर्माण की दिशा में योगदान दिया।
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भारतीय रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया में मुख्य प्रशासनिक मुद्दे और सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएँ
प्रशासनिक मुद्दे:
सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएँ:
इन मुद्दों का समाधान संवाद, संवैधानिक उपायों और संवेदनशीलता के साथ किया गया, जिससे भारतीय संघ की एकता और अखंडता को बनाए रखा जा सका।
See lessयंग बंगाल एवं ब्रह्मो समाज के विशेष संदर्भ में सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों के उत्थान तथा विकास को रेखांकित कीजिए। (150 words)[UPSC 2021]
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यंग बंगाल और ब्रह्मो समाज के संदर्भ में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन
यंग बंगाल आंदोलन:
ब्रह्मो समाज:
निष्कर्ष:
यंग बंगाल और ब्रह्मो समाज ने भारतीय समाज में सामाजिक और धार्मिक सुधारों को प्रोत्साहित किया। इनके प्रयासों ने शिक्षा, सामाजिक न्याय, और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो आधुनिक भारत की नींव रखे।
See lessभारत में औपनिवेशिक शासन ने आदिवासियों को कैसे प्रभावित किया और औपनिवेशिक उत्पीड़न के प्रति आदिवासी प्रतिक्रिया क्या थी? (250 words) [UPSC 2023]
भारत में औपनिवेशिक शासन ने आदिवासियों पर गहरा प्रभाव डाला और उनकी सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक जीवनशैली को काफी प्रभावित किया। ब्रिटिश शासन के दौरान, आदिवासी क्षेत्रों में औपनिवेशिक नीतियों और भूमि अधिग्रहण ने उनकी पारंपरिक जमीनों और संसाधनों को छीन लिया। वन नीति, जैसे कि "वन अधिनियम" ने आदिवासियोRead more
भारत में औपनिवेशिक शासन ने आदिवासियों पर गहरा प्रभाव डाला और उनकी सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक जीवनशैली को काफी प्रभावित किया। ब्रिटिश शासन के दौरान, आदिवासी क्षेत्रों में औपनिवेशिक नीतियों और भूमि अधिग्रहण ने उनकी पारंपरिक जमीनों और संसाधनों को छीन लिया। वन नीति, जैसे कि “वन अधिनियम” ने आदिवासियों की पारंपरिक वन संपत्ति पर नियंत्रण कर लिया और उनके जंगलों का व्यापारिक उपयोग बढ़ा दिया। इससे आदिवासियों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और उनकी पारंपरिक कृषि और शिकार की प्रथाओं में बाधा आई।
औपनिवेशिक प्रशासन ने आदिवासियों के सामाजिक ढांचे को भी बाधित किया। उन्हें शोषण और भेदभाव का सामना करना पड़ा, जो उनकी पहचान और सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ था। उपनिवेशिक शासन ने स्थानीय स्वशासन और परंपरागत नेतृत्व प्रणालियों को कमजोर किया, जिससे आदिवासियों की राजनीतिक शक्ति भी घट गई।
इन उत्पीड़नों के प्रति आदिवासियों ने विभिन्न प्रतिक्रियाएँ दी। कई आदिवासी समुदायों ने सशस्त्र संघर्ष और विद्रोह के माध्यम से प्रतिरोध किया। ‘संताली विद्रोह’ (1855-1856) और ‘मौंडा विद्रोह’ (1899-1900) जैसे आंदोलनों ने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ सक्रिय प्रतिरोध व्यक्त किया। इन विद्रोहों ने आदिवासियों की सामाजिक और आर्थिक समानता की पुनर्निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन प्रतिक्रियाओं ने अंततः औपनिवेशिक नीति में सुधार के लिए एक सामाजिक जागरूकता पैदा की और आदिवासी अधिकारों के प्रति सरकार की संवेदनशीलता को बढ़ाया।
See lessशिक्षा और विदेशी मामलों के क्षेत्र में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के योगदान को वर्णित कीजिए। (उत्तर 250 शब्दों में दें)
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, भारतीय राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद्, और भारतीय दर्शनशास्त्र के प्रमुख व्यक्ति थे। उन्होंने अपने जीवन के दौरान शिक्षा और विदेशी मामलों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। राधाकृष्णन ने भारतीय शिक्षा के विकास में अहम भूमिका निभाई और शिक्षा को जनता तक पहुंचाने के लिए कई योजनाएं चRead more
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, भारतीय राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद्, और भारतीय दर्शनशास्त्र के प्रमुख व्यक्ति थे। उन्होंने अपने जीवन के दौरान शिक्षा और विदेशी मामलों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। राधाकृष्णन ने भारतीय शिक्षा के विकास में अहम भूमिका निभाई और शिक्षा को जनता तक पहुंचाने के लिए कई योजनाएं चलाई।
उन्होंने भारतीय संस्कृति और दर्शन के महत्व को विदेशों में प्रस्तुत किया और इससे भारत की पहचान को बढ़ाया। उन्होंने भारतीय संस्कृति को ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर प्रस्तुत किया और विश्व भर में भारतीय दर्शन की महिमा को बढ़ावा दिया।
उनकी शिक्षा और विदेशी मामलों में उनकी विचारशीलता, विद्वत्ता, और समर्पण ने एक महत्वपूर्ण प्रभाव डाला। उनके योगदान से भारतीय शिक्षा और संस्कृति को ग्लोबल स्तर पर मान्यता मिली और उन्होंने भारत की पहचान को विश्व स्तर पर मजबूत किया।
See lesswhat is the best monsoon seasonal crop, with less investment?
For a monsoon seasonal crop with less investment, pulses like mooing deal (green gram) and oared deal (black gram) are excellent choices. These crops have several advantages: Why Pulses (Moong Dal and Urd Dal)? Lower Input Costs: Pulses generally require fewer inputs like fertilizers and pesticidesRead more
For a monsoon seasonal crop with less investment, pulses like mooing deal (green gram) and oared deal (black gram) are excellent choices. These crops have several advantages:
Why Pulses (Moong Dal and Urd Dal)?
Lower Input Costs:
Pulses generally require fewer inputs like fertilizers and pesticides compared to other crops. They also do not need heavy irrigation, relying primarily on monsoon rains.
Short Growth Duration:
Mooing deals and ad deals have a short growing period, typically around 60-70 days, allowing farmers to harvest them quickly and possibly grow another crop in the same season.
Soil Fertility Improvement:
Pulses are nitrogen-fixing crops, meaning they improve soil fertility by fixing atmospheric nitrogen into the soil, reducing the need for synthetic fertilizers for subsequent crops.
Good Market Demand:
There is consistent market demand for pulses in India, as they are a staple in Indian diets. Prices for these crops are relatively stable, offering a good return on investment.
Resistance to Diseases and Pests:
Pulses are generally more resistant to diseases and pests compared to other crops like vegetables or cereals, reducing the need for expensive pest control measures.
See lessOther Options:
Millets (Bajra, Jowar): Millets are another good choice for monsoon farming with low investment. They are drought-resistant and can grow well with minimal water and inputs.
Groundnut: Groundnut is another crop that can be grown during the monsoon with moderate investment and provides good returns, especially if there’s access to a local market.
Conclusion:
Moong dal and urd dal are among the best monsoon crops for farmers looking to minimize investment while still ensuring a good return. These crops are low-maintenance, improve soil health, and have strong market demand, making them ideal for small to medium-scale farmers.
अधिकांश भारतीय सिपाहियों वाली ईस्ट इंडिया की सेना क्यों तत्कालीन भारतीय शासकों की संख्याबल में अधिक और बेहतर सुसज्जित सेना से लगातार जीतती रही ? कारण बताएँ । (150 words)[UPSC 2022]
संगठित और पेशेवर सैन्य संरचना: ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में एक संगठित और पेशेवर सैन्य संरचना थी, जो नियमित प्रशिक्षण और अनुशासन पर आधारित थी। इसके विपरीत, भारतीय शासकों की सेनाएँ प्रायः स्थानीय और सामंती प्रथाओं पर निर्भर थीं। आधुनिक हथियार और युद्ध तकनीक: ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने बेहतरRead more
इन कारणों के परिणामस्वरूप, ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने भारतीय शासकों की सेनाओं पर विजय प्राप्त की और भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी स्थिति मजबूत की।
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