चर्चा कीजिए कि वे कौन-से संभावित कारक हैं जो भारत को राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व में प्रदत्त के अनुसार अपने नागरिकों के लिए समान सिविल संहिता को अभिनियमित करने से रोकते हैं। (200 words) [UPSC 2015]
भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 की परिधि में अधिकार 1. जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार: अनुच्छेद 21 के तहत, हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। यह अधिकार कानूनी प्रक्रिया के अनुसार सुरक्षित है। 2. स्वास्थ्य और स्वच्छता: Right to Health: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में 'फRead more
भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 की परिधि में अधिकार
1. जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार:
- अनुच्छेद 21 के तहत, हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। यह अधिकार कानूनी प्रक्रिया के अनुसार सुरक्षित है।
2. स्वास्थ्य और स्वच्छता:
- Right to Health: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ‘फिरोज़ शाह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले में स्वास्थ्य का अधिकार को जीवन के अधिकार का हिस्सा मानते हुए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और पहुंच सुनिश्चित करने की आवश्यकता को बल दिया।
3. शिक्षा का अधिकार:
- Right to Education: 2002 में 86वें संविधान संशोधन के तहत, अनुच्छेद 21 में शिक्षा का अधिकार जोड़ा गया, जो 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करता है।
4. स्वच्छता का अधिकार:
- Right to Clean Environment: 1996 में ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन बनाम भारत सरकार’ मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्वच्छ पर्यावरण को जीवन के अधिकार के अंतर्गत माना।
5. जीविका का अधिकार:
- Right to Livelihood: 1978 में ‘के.के. साही बनाम राज्य’ में, कोर्ट ने जीविका का अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मान्यता दी, जिससे गरीब और वंचित वर्गों को जीवन जीने के लिए आवश्यक संसाधन प्राप्त करने का अधिकार मिला।
निष्कर्ष
अनुच्छेद 21 भारतीय संविधान के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की व्यापक सुरक्षा प्रदान करता है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता, और जीविका जैसे अधिकार शामिल हैं। ये अधिकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा विभिन्न निर्णयों के माध्यम से विस्तारित और मजबूत किए गए हैं।
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भारत में समान सिविल संहिता (UCC) को लागू करने में कई कारक बाधा डालते हैं: धार्मिक विविधता: भारत में विभिन्न धर्मों के अनुयायी अपने-अपने व्यक्तिगत कानूनों का पालन करते हैं, जैसे हिंदू कानून, मुस्लिम कानून, और ईसाई कानून। इन विविधताओं को एक समान संहिता में समेटना कठिन है, क्योंकि प्रत्येक समुदाय अपनेRead more
भारत में समान सिविल संहिता (UCC) को लागू करने में कई कारक बाधा डालते हैं:
धार्मिक विविधता: भारत में विभिन्न धर्मों के अनुयायी अपने-अपने व्यक्तिगत कानूनों का पालन करते हैं, जैसे हिंदू कानून, मुस्लिम कानून, और ईसाई कानून। इन विविधताओं को एक समान संहिता में समेटना कठिन है, क्योंकि प्रत्येक समुदाय अपने पारंपरिक कानूनों को संरक्षित रखना चाहता है।
राजनीतिक संवेदनशीलता: UCC एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा है। राजनीतिक दल अपने वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर एकराय नहीं बना पाते। खासकर धार्मिक आधार पर वोटिंग के चलते किसी भी बदलाव से राजनीतिक हानि का डर होता है।
सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यता: कई समुदाय अपने धार्मिक कानूनों को सांस्कृतिक और पहचान से जुड़े मुद्दों के रूप में देखते हैं। UCC के माध्यम से इन कानूनों में बदलाव करने से इन समुदायों के पहचान पर खतरा माना जाता है।
कानूनी और व्यवस्थागत चुनौतियाँ: समान सिविल संहिता को लागू करने के लिए जटिल कानूनी और व्यवस्थागत ढांचे की आवश्यकता होती है। इसके लिए सभी समुदायों का समर्थन और व्यापक सलाह-मशविरा आवश्यक है, जो कठिन हो सकता है।
इन कारकों के कारण, भारत में UCC को लागू करने में कठिनाई आती है, जिससे समानता और न्याय की दिशा में कदम उठाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
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