भारत के आमचुनाव में मतदाता निरीक्षण पेपर ऑडिट ट्रायल (VVPAT) के प्रयोग का मूल्यांकन कीजिये।(125 Words) [UPPSC 2018]
फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ व्यवस्था का भारतीय संदर्भ में आलोचनात्मक मूल्यांकन परिचय ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ (FPTP) चुनावी व्यवस्था एक ऐसी प्रणाली है जिसमें चुनावी क्षेत्र में सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार जीतता है, भले ही उसे कुल मतों का बहुमत न मिले। भारत में इस व्यवस्था का उपयोग लोकसभा और कईRead more
फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ व्यवस्था का भारतीय संदर्भ में आलोचनात्मक मूल्यांकन
परिचय
‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ (FPTP) चुनावी व्यवस्था एक ऐसी प्रणाली है जिसमें चुनावी क्षेत्र में सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार जीतता है, भले ही उसे कुल मतों का बहुमत न मिले। भारत में इस व्यवस्था का उपयोग लोकसभा और कई राज्य विधानसभाओं के चुनावों में किया जाता है। इस व्यवस्था का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने के लिए, इसके लाभ और सीमाओं पर ध्यान देना आवश्यक है।
फर्स्ट पास्ट द पोस्ट व्यवस्था की विशेषताएँ
- सरल और स्पष्ट
- प्रस्तावना: FPTP प्रणाली सरल और समझने में आसान है, जिससे मतदाता और उम्मीदवार दोनों के लिए प्रक्रिया स्पष्ट होती है।
- उदाहरण: 2019 के लोकसभा चुनाव में, भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) ने FPTP प्रणाली का लाभ उठाते हुए स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया, जिससे सरकार बनाने में आसानी हुई।
- स्थिरता और मजबूत सरकार
- स्थिरता: FPTP व्यवस्था आमतौर पर स्थिर सरकारों को प्रोत्साहित करती है, क्योंकि यह एक प्रमुख दल को बहुमत में लाती है।
- उदाहरण: 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला, जिससे स्थिरता और निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहजता रही।
FPTP व्यवस्था की सीमाएँ
- प्रसारिता और प्रतिनिधित्व की कमी
- प्रतिनिधित्व: इस प्रणाली में, छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। यह प्रणाली अक्सर बहुमत को अभिव्यक्त करती है, जबकि अल्पसंख्यक विचारों को नजरअंदाज करती है।
- उदाहरण: राजनीतिक दलों की रिपोर्ट के अनुसार, छोटे दल और निर्दलीय उम्मीदवार अक्सर FPTP प्रणाली में प्रभावी प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं कर पाते, जैसे कि 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में, कई छोटे दलों को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिला।
- स्ट्रैटेजिक वोटिंग और ऐडवांसिंग
- स्ट्रैटेजिक वोटिंग: मतदाता अक्सर रणनीतिक मतदान करते हैं, जिसका उद्देश्य एक पसंदीदा उम्मीदवार को जीत दिलाना और एक अन्य उम्मीदवार को हराना होता है।
- उदाहरण: 2014 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में, कई मतदाताओं ने रणनीतिक मतदान किया, ताकि भारतीय जनता पार्टी को हराया जा सके और आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया जा सके, जो अंततः चुनावी परिणाम को प्रभावित करता है।
- सामाजिक और क्षेत्रीय विभाजन
- सामाजिक बंटवारा: FPTP प्रणाली सामाजिक और क्षेत्रीय आधार पर चुनावी बंटवारे को बढ़ावा देती है, जिससे कुछ समूहों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलता है और दूसरों को कम।
- उदाहरण: 2019 के जम्मू-कश्मीर चुनाव में, क्षेत्रीय और सामाजिक विभाजन की वजह से कई क्षेत्रीय दलों को बेहतर परिणाम प्राप्त हुए, जबकि अन्य क्षेत्रों में बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ कमजोर पड़ गईं।
- वोटर का निराशाजनक अनुभव
- निराशाजनक अनुभव: FPTP प्रणाली में, कई मतदाता महसूस करते हैं कि उनके वोट का प्रभाव नगण्य हो सकता है, खासकर जब उनकी पसंदीदा पार्टी हार जाती है।
- उदाहरण: 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में, कई मतदाता अपनी पसंदीदा पार्टी की हार के कारण निराश हुए, क्योंकि उनकी पार्टी को जीतने के लिए पर्याप्त मत नहीं मिले।
वैकल्पिक प्रणाली
- प्रस्तावित समाधान: भारत में कई विशेषज्ञ FPTP के स्थान पर अनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) प्रणाली को लागू करने की सिफारिश करते हैं, जो अधिक समावेशी और प्रतिनिधित्वात्मक हो सकती है।
- उदाहरण: आंध्र प्रदेश में ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव में अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की चर्चा की गई है, जो एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
निष्कर्ष
‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ व्यवस्था के भारतीय संदर्भ में एक मिश्रित प्रभाव है। जहां यह प्रणाली चुनावी प्रक्रिया को सरल और स्थिर बनाती है, वहीं इसके द्वारा प्रतिनिधित्व की कमी, रणनीतिक मतदान, और सामाजिक विभाजन की समस्याएँ भी उभरती हैं। इन सीमाओं के मद्देनजर, वैकल्पिक चुनावी प्रणालियों की चर्चा और संभावनाएँ विचारणीय हैं, जो भविष्य में अधिक समावेशी और प्रतिनिधित्वात्मक चुनावी परिदृश्य को प्रोत्साहित कर सकती हैं। UPSC Mains उम्मीदवारों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि विभिन्न चुनावी प्रणालियाँ कैसे काम करती हैं और उनके संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं।
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मतदाता निरीक्षण पेपर ऑडिट ट्रायल (VVPAT) का मूल्यांकन 1. पारदर्शिता और विश्वास: VVPAT प्रणाली ने मतदान की पारदर्शिता और विश्वास को बढ़ाया है। यह सुनिश्चित करती है कि मतदाता की पर्ची का रिकॉर्ड डिजिटल वोटिंग के साथ मेल खाता है। हाल के लोकसभा चुनाव (2019) में, VVPAT ने चुनाव परिणामों की सटीकता को सुनिRead more
मतदाता निरीक्षण पेपर ऑडिट ट्रायल (VVPAT) का मूल्यांकन
1. पारदर्शिता और विश्वास: VVPAT प्रणाली ने मतदान की पारदर्शिता और विश्वास को बढ़ाया है। यह सुनिश्चित करती है कि मतदाता की पर्ची का रिकॉर्ड डिजिटल वोटिंग के साथ मेल खाता है। हाल के लोकसभा चुनाव (2019) में, VVPAT ने चुनाव परिणामों की सटीकता को सुनिश्चित किया।
2. विवाद समाधान: VVPAT की उपस्थिति ने विवादित मतपत्रों के मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कर्नाटक विधानसभा चुनाव (2018) में, VVPAT ने मतपत्रों की सटीकता की पुष्टि करने में मदद की, जिससे मतदाता के संदेहों का समाधान हुआ।
3. तकनीकी और प्रशासनिक चुनौती: VVPAT प्रणाली को लागू करने में तकनीकी और प्रशासनिक चुनौतियाँ सामने आई हैं, जैसे कि मशीनों में तकनीकी खराबियाँ और पुन: गणना में समय की देरी। इन समस्याओं का समाधान करना आवश्यक है ताकि प्रणाली की प्रभावशीलता और विश्वसनीयता बनी रहे।
VVPAT का उपयोग भारतीय चुनावों में लोकतंत्र के प्रति विश्वास और सटीकता को बढ़ाने में सहायक रहा है, लेकिन इसके साथ जुड़ी समस्याओं का समाधान भी आवश्यक है।
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