उत्तर लेखन के लिए रोडमैप
1. प्रस्तावना
- परिचय: अशोक का ‘धम्म’ और इसका महत्व।
- धम्म की परिभाषा: संस्कृत ‘धर्म’ का प्राकृत रूप, जिसमें पूजा या धार्मिक संस्कार शामिल नहीं हैं।
2. सार्वजनिक नैतिकता की मुख्य शिक्षाएं
(i) अहिंसा की नीति
- विवरण: युद्ध और हिंसा के बजाय धम्म विजय का समर्थन।
- स्रोत: अशोक के शिलालेख, 3वीं सदी ईसा पूर्व।
(ii) करुणा और कल्याण
- विवरण: पशु वलि, मांस और मदिरा के सेवन का निषेध।
- स्रोत: धम्म और सार्वजनिक नैतिकता, 2021।
(iii) धार्मिक सहिष्णुता
- विवरण: ‘सर्वधर्म समभाव’ की अवधारणा।
- स्रोत: अशोक के शिलालेख, 2020।
(iv) पैतृक राजत्व
- विवरण: राजा को प्रजा को संतान के रूप में देखना।
- स्रोत: अशोक के सिद्धांत।
3. लोक सेवकों के लिए प्रासंगिकता
(i) सत्य का सिद्धांत
- विवरण: पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना।
(ii) पैतृक राजत्व का आदर्श
- विवरण: भ्रष्टाचार और पक्षपात से लड़ने में सहायता।
(iii) संयम और भाव-शुद्धि
- विवरण: नैतिक चरित्र को मजबूत करना।
(iv) शुश्रूषा का आदर्श
- विवरण: लोक सेवाओं के लिए प्रेरणा।
4. निष्कर्ष
- सारांश: धम्म के सिद्धांतों का महत्व और लोक सेवकों के लिए उनकी प्रासंगिकता।
प्रासंगिक तथ्य
- अहिंसा की नीति: “धम्म विजय” का समर्थन (अशोक के शिलालेख, 3वीं सदी ईसा पूर्व)।
- करुणा और कल्याण: पशु वलि और मांस के सेवन का निषेध (धम्म और सार्वजनिक नैतिकता, 2021)।
- धार्मिक सहिष्णुता: ‘सर्वधर्म समभाव’ की अवधारणा (अशोक के शिलालेख, 2020)।
- पैतृक राजत्व: राजा को प्रजा को संतान के रूप में देखने का आदर्श (अशोक के सिद्धांत)।
- सत्य का सिद्धांत: पारदर्शिता और जवाबदेही (लोक प्रशासन समीक्षा, 2022)।
इस रोडमैप का उपयोग करके आप एक संगठित और प्रभावी उत्तर तैयार कर सकते हैं।
अशोक के ‘धम्म’ के आदर्शों की मुख्य शिक्षाएँ
अशोक का ‘धम्म’ मानवता और सार्वजनिक नैतिकता का एक व्यापक सिद्धांत था, जिसे उन्होंने अपने शासन में लागू किया। उनके आदर्शों में निम्नलिखित बिंदु प्रमुख थे:
समानता और अहिंसा: अशोक ने अहिंसा और समानता को प्राथमिकता दी। उन्होंने सभी प्राणियों के प्रति दया और करुणा की आवश्यकता पर जोर दिया।
धर्म का पालन: अशोक ने धर्म के पालन को अत्यधिक महत्व दिया, जो न केवल धार्मिक, बल्कि नैतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण था।
लोक कल्याण: अशोक ने जनता के हित में कई कार्य किए, जैसे अस्पतालों की स्थापना और जल आपूर्ति की व्यवस्था।
सत्य और न्याय: उन्होंने न्याय और सत्य के मार्ग को अपनाया, जिससे शासन में पारदर्शिता आई।
लोक सेवकों के लिए प्रासंगिकता
ईमानदारी और पारदर्शिता: आज भी लोक सेवकों को सार्वजनिक सेवा में ईमानदारी और पारदर्शिता की आवश्यकता है, जैसा कि अशोक ने अपने शासन में किया था।
जनता का कल्याण: जैसे अशोक ने जनता के भले के लिए कई सुधार किए, वैसे ही आज के सरकारी अधिकारी भी जनकल्याण की ओर अग्रसर होने चाहिए।
संवेदनशीलता और समाजसेवा: अशोक की तरह, आज के लोक सेवक भी समाज की समस्याओं के प्रति संवेदनशील और समर्पित होने चाहिए।
अशोक के ‘धम्म’ नीति के आदर्श
सम्राट अशोक की ‘धम्म’ नीति उनके शासनकाल का केंद्रीय तत्व थी, जो नैतिकता, अहिंसा और लोक कल्याण पर आधारित थी। उनकी नीति की प्रमुख शिक्षाएँ निम्नलिखित थीं:
अहिंसा और दया: अशोक ने सभी प्राणियों के प्रति हिंसा को त्यागने और दया भाव अपनाने का निर्देश दिया।
सत्य बोलना: सत्य को सर्वोपरि मानते हुए, उन्होंने अपने राज्य में सत्य बोलने को प्रोत्साहित किया।
धर्मानुशासन और आत्मनिरीक्षण: नियमित आत्मनिरीक्षण और धर्म के प्रति प्रतिबद्धता की आवश्यकता पर बल दिया।
कल्याणकारी कार्य: सार्वजनिक भलाई के लिए अस्पताल, कुएँ खुदवाना, और वृक्षारोपण जैसे कार्यों को बढ़ावा दिया।
धार्मिक सहिष्णुता: सभी धर्मों का सम्मान करते हुए, उन्होंने धार्मिक विविधता को स्वीकार किया।
लोक सेवकों के लिए प्रासंगिकता
अशोक के ये आदर्श आज के लोक सेवकों के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं:
नैतिक नेतृत्व: ईमानदारी और सत्यनिष्ठा से नेतृत्व प्रदान करना।
जनकल्याण: सार्वजनिक कल्याणकारी योजनाओं का कार्यान्वयन और समाज की भलाई के लिए कार्य करना।
धार्मिक समरसता: विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों के बीच सामंजस्य स्थापित करना।
सतत सुधार: निरंतर आत्मनिरीक्षण और सुधार के माध्यम से व्यक्तिगत और पेशेवर विकास की ओर अग्रसर होना।
अशोक की ‘धम्म’ नीति से प्रेरित होकर, लोक सेवक समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं और एक न्यायपूर्ण और समृद्ध समाज की स्थापना में योगदान दे सकते हैं।