निम्नलिखित में से प्रत्येक उद्धरण का आपके विचार से क्या अभिप्राय है ?
a. “किसी की भर्त्सना नहीं कीजिए अगर आप मदद का हाथ आगे बढ़ा सकते हैं, तो ऐसा कीजिए । यदि नहीं तो आप हाथ जोड़िए, अपने बंधुओं को आशीर्वचन दीजिए और उन्हें अपने मार्ग पर जाने दीजिए।” – स्वामी विवेकानंद (150 words) [UPSC 2020]
b. “स्वयं को खोजने का सर्वोत्तम मार्ग यह है कि अपने आप को अन्य की सेवा में खो दें।” – महात्मा गाँधी (150 words) [UPSC 2020]
c. “नैतिकता की एक व्यवस्था जो कि सापेक्ष भावनात्मक मूल्यों पर आधारित है केवल एक भ्रांति है, एक अत्यंत अशिष्ट अवधारण जिसमें कुछ भी युक्तिसंगत नहीं है और न ही सत्य ।” – सुकरात (150 words) [UPSC 2020]
a. “किसी की भर्त्सना नहीं कीजिए अगर आप मदद का हाथ आगे बढ़ा सकते हैं, तो ऐसा कीजिए। यदि नहीं तो आप हाथ जोड़िए, अपने बंधुओं को आशीर्वचन दीजिए और उन्हें अपने मार्ग पर जाने दीजिए।” – स्वामी विवेकानंद
अभिप्राय और व्याख्या: स्वामी विवेकानंद का यह उद्धरण दया और सहानुभूति पर बल देता है। इसका तात्पर्य है कि यदि हमारे पास किसी की मदद करने की क्षमता है, तो हमें निस्वार्थ सहायता करनी चाहिए। यदि मदद करना संभव नहीं है, तो हमें विचारशीलता और अच्छे इरादों के साथ उन्हें उनके मार्ग पर चलने देना चाहिए। आलोचना और निंदा करने के बजाय, यह दृष्टिकोण सकारात्मक और समर्थनकारी रवैये को बढ़ावा देता है।
हालिया उदाहरण: कोविड-19 महामारी के दौरान, कई लोगों और संगठनों ने निस्वार्थ सहायता प्रदान की, जैसे कि चिकित्सा सहायता और राशन वितरण। इसके विपरीत, आलोचना और निंदा करने से अधिक लाभकारी था, जैसे कि सकारात्मक योगदान और सहायता प्रदान करना।
b. “स्वयं को खोजने का सर्वोत्तम मार्ग यह है कि अपने आप को अन्य की सेवा में खो दें।” – महात्मा गाँधी
अभिप्राय और व्याख्या: महात्मा गाँधी का यह उद्धरण यह दर्शाता है कि स्वयं की खोज और आत्म-साक्षात्कार सबसे अच्छा तब होता है जब हम दूसरों की सेवा में खुद को समर्पित कर देते हैं। दूसरों की भलाई के लिए काम करने से हमें अथाह संतोष और आत्मा की गहराई प्राप्त होती है, और यह हमें अपनी असली पहचान और उद्देश्य को जानने में मदद करता है।
हालिया उदाहरण: सामाजिक सेवा और स्वयंसेवा के प्रयास, जैसे कि प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत कार्य और शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में योगदान, इस उद्धरण की पुष्टि करते हैं। स्वयंसेवक जो दूसरों की सेवा में अपना समय और ऊर्जा लगाते हैं, वे अक्सर एक गहरा आंतरिक संतोष और जीवन की दिशा अनुभव करते हैं।
c. “नैतिकता की एक व्यवस्था जो कि सापेक्ष भावनात्मक मूल्यों पर आधारित है केवल एक भ्रांति है, एक अत्यंत अशिष्ट अवधारण जिसमें कुछ भी युक्तिसंगत नहीं है और न ही सत्य।” – सुकरात
अभिप्राय और व्याख्या: सुकरात का यह उद्धरण इस विचार को व्यक्त करता है कि नैतिकता यदि केवल व्यक्तिगत भावनाओं और सांस्कृतिक मान्यताओं पर निर्भर है, तो यह एक अस्थिर और भ्रामक प्रणाली होती है। वास्तविक नैतिकता को सार्वभौमिक और वस्तुनिष्ठ सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए, जो हर स्थिति में समान रूप से लागू हो।
हालिया उदाहरण: नैतिक सापेक्षवाद और नैतिक निरपेक्षता की बहस इस उद्धरण से संबंधित है। उदाहरण के लिए, मानवाधिकार के मुद्दों पर विभिन्न सांस्कृतिक दृष्टिकोण और व्यक्तिगत भावनाओं की बजाय एक सार्वभौमिक नैतिक मानक की आवश्यकता होती है, ताकि न्याय और समानता को सुनिश्चित किया जा सके।