क्या संवर्ग आधारित सिविल सेवा संगठन भारत में धीमे परिवर्तन का कारण रहा हैं? समालोचनापूर्वक परीक्षण कीजिये। (200 words) [UPSC 2014]
पारम्परिक अधिकारीतंत्रीय संरचना और संस्कृति का सामाजिक-आर्थिक विकास पर प्रभाव परिचय भारत की पारम्परिक अधिकारीतंत्रीय संरचना और संस्कृति, जो औपनिवेशिक काल की विरासत है, सामाजिक-आर्थिक विकास की प्रक्रिया में कई बार बाधा डालती है। यह प्रणाली अक्सर धीमे निर्णय लेने, बदलाव के प्रति प्रतिरोध, और पारदर्शितRead more
पारम्परिक अधिकारीतंत्रीय संरचना और संस्कृति का सामाजिक-आर्थिक विकास पर प्रभाव
परिचय भारत की पारम्परिक अधिकारीतंत्रीय संरचना और संस्कृति, जो औपनिवेशिक काल की विरासत है, सामाजिक-आर्थिक विकास की प्रक्रिया में कई बार बाधा डालती है। यह प्रणाली अक्सर धीमे निर्णय लेने, बदलाव के प्रति प्रतिरोध, और पारदर्शिता की कमी से ग्रस्त रहती है।
चुनौतियाँ और प्रभाव
- धीमा निर्णय लेने की प्रक्रिया:
- पारम्परिक अधिकारीतंत्रीय संरचना की जटिलताओं के कारण निर्णय लेने में समय लगता है। उदाहरण के लिए, दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा (DMIC) के लिए भूमि अधिग्रहण में लंबे समय तक देरी हुई, जिससे परियोजनाओं की प्रगति में रुकावट आई।
- परिवर्तन के प्रति प्रतिरोध:
- सरकारी विभाग अक्सर नए सुधारों और नवाचारों के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। जीएसटी (वस्तु और सेवा कर) के कार्यान्वयन में भी पारम्परिक ढांचे की जटिलताओं और प्रतिरोध ने समस्याएँ पैदा की, जिससे ट्रांजिशन में कठिनाई हुई।
- जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी:
- पारम्परिक संरचना में जवाबदेही की कमी और पारदर्शिता का अभाव होता है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला जैसे भ्रष्टाचार के मामलों ने इस समस्या को उजागर किया, जिससे सरकार पर विश्वास कम हुआ।
हाल के सुधार और उपाय
- डिजिटल पहल:
- डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस जैसे पहल पारम्परिक संरचना की बाधाओं को दूर करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। आधार जैसे डिजिटल टूल्स ने सेवाओं की पहुंच और पारदर्शिता में सुधार किया है।
- प्रशासनिक सुधार:
- मिशन कर्मयोगी और मध्य प्रदेश मॉडल जैसे कार्यक्रम पारम्परिक ढांचे को आधुनिक बनाने और प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के प्रयास हैं।
निष्कर्ष पारम्परिक अधिकारीतंत्रीय संरचना और संस्कृति ने भारत में सामाजिक-आर्थिक विकास की प्रक्रिया में कई बार बाधा डाली है। हालांकि, हाल के सुधारों और डिजिटल पहलों से इस ढांचे को आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। ये सुधार भारत की विकास प्रक्रिया को तेज करने में सहायक हो सकते हैं।
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परिचय भारत में संवर्ग आधारित सिविल सेवा संगठन, जिसमें आई.ए.एस., आई.पी.एस. जैसी सेवाएँ शामिल हैं, स्वतंत्रता के बाद से प्रशासनिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। हालांकि, यह प्रणाली धीमे परिवर्तन का कारण भी मानी जाती है। केंद्रीकृत संरचना और नौकरशाही की कठोरता संवर्ग आधारित प्रणाली की केंदRead more
परिचय
भारत में संवर्ग आधारित सिविल सेवा संगठन, जिसमें आई.ए.एस., आई.पी.एस. जैसी सेवाएँ शामिल हैं, स्वतंत्रता के बाद से प्रशासनिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। हालांकि, यह प्रणाली धीमे परिवर्तन का कारण भी मानी जाती है।
केंद्रीकृत संरचना और नौकरशाही की कठोरता
संवर्ग आधारित प्रणाली की केंद्रीकृत संरचना और नौकरशाही की कठोरता अक्सर आलोचना का विषय रही है। उदाहरण के लिए, GST (वस्तु और सेवा कर) को लागू करने में काफी समय लगा, जिसका एक कारण नौकरशाही प्रक्रियाओं में जटिलता और पारंपरिक दृष्टिकोण की अनुपस्थिति थी। इसी तरह, पांच वर्षीय योजनाओं और नीतिगत सुधारों के कार्यान्वयन में भी इसी प्रकार की बाधाएँ देखी गई हैं।
जवाबदेही और नवाचार की कमी
संवर्ग प्रणाली की उच्च-स्तरीय संरचना में जवाबदेही और नवाचार की कमी देखी जाती है। अधिकारियों की अक्सर स्थानांतरण और विभागों में परिवर्तन से स्थानीय मुद्दों की गहरी समझ में कमी आती है। जैसे कि स्वच्छ भारत मिशन के कार्यान्वयन में स्थानीय अनुकूलन और फॉलो-अप की कमी के कारण चुनौतियाँ आईं।
हालिया सुधार और परिवर्तन
हाल के प्रयास जैसे अटल नवाचार मिशन और बिजनेस में आसानी सुधार कुछ समस्याओं को संबोधित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन संवर्ग आधारित संरचना में अंतर्निहित जटिलताएँ अभी भी मौजूद हैं।
निष्कर्ष
संवर्ग आधारित सिविल सेवा संगठन ने प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन इसकी केंद्रीकृत और कठोर संरचना धीमे परिवर्तन का कारण भी बन सकती है। लगातार सुधार और लचीलापन को बढ़ावा देकर परिवर्तन की गति को तेज किया जा सकता है।
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