तक्षशिला विश्वविद्यालय विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में से एक था जिसके साथ विभिन्न शिक्षण-विषयों (डिसिप्लिन्स) के अनेक विख्यात विद्वानी व्यक्तित्व सम्बन्धित थे। उसकी रणनीतिक अवस्थिति के कारण उसकी कीर्ति फैली, लेकिन नालन्दा के विपरीत, उसे आधुनिक अभिप्राय में.. विश्वविद्यालय नहीं ...
भारत में मुद्राशास्त्र (Numismatics) का इतिहास प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक विविध और समृद्ध रहा है। प्राचीन काल में भारतीय मुद्राओं की शुरुआत सिक्कों के रूप में हुई, जो लगभग 6वीं सदी ई.पू. के आसपास ईरान और मैसोपोटामिया से प्रभावित थे। मौर्य साम्राज्य के समय, चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक के सिक्कोंRead more
भारत में मुद्राशास्त्र (Numismatics) का इतिहास प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक विविध और समृद्ध रहा है।
प्राचीन काल में भारतीय मुद्राओं की शुरुआत सिक्कों के रूप में हुई, जो लगभग 6वीं सदी ई.पू. के आसपास ईरान और मैसोपोटामिया से प्रभावित थे। मौर्य साम्राज्य के समय, चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक के सिक्कों में विविधता आई, जिसमें चांदी, तांबा और स्वर्ण सिक्के शामिल थे। गुप्त काल में, सिक्कों का स्वर्ण प्रयोग प्रमुख था, और गुप्त साम्राज्य की समृद्धि को दर्शाने वाले सुंदर और सुव्यवस्थित सिक्के प्रचलित थे।
मुस्लिम शासकों के आगमन के साथ, तांबे और चांदी के सिक्कों की नई श्रृंखलाएँ प्रचलित हुईं। मुघल साम्राज्य में सिक्कों का अत्यधिक कला और कलात्मकता में उन्नति हुई। अकबर के समय, सिक्कों पर नाम, तारीख और शाही प्रतीक उकेरे जाते थे।
ब्रिटिश काल में, भारतीय मुद्रा प्रणाली को एकीकृत किया गया और रुपये का प्रयोग सामान्य हुआ। भारतीय सिक्कों पर ब्रिटिश और स्थानीय प्रतीकों का मिश्रण देखा गया।
आधुनिक काल में, स्वतंत्रता के बाद भारतीय मुद्रा में रूपांतर हुए, और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा सिक्कों की देखरेख की गई। आजकल, भारतीय सिक्के विभिन्न रूपों और मानकों में उपलब्ध हैं।
सिक्कों का अध्ययन इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि सिक्के समय की सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों का प्रत्यक्ष प्रमाण होते हैं। सिक्कों पर अंकित चित्र और लेखन सामाजिक संरचनाओं, शासकों की नीतियों, व्यापारिक संबंधों और सामाजिक आस्थाओं के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। इसके माध्यम से ऐतिहासिक घटनाओं और कालखंडों की विस्तृत और सटीक जानकारी प्राप्त की जा सकती है, जो अन्य ऐतिहासिक स्रोतों में उपलब्ध नहीं हो सकती।
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तक्षशिला विश्वविद्यालय: प्राचीन शिक्षा केंद्र और आधुनिक विश्वविद्यालय की तुलना **1. ऐतिहासिक महत्व तक्षशिला विश्वविद्यालय, वर्तमान पाकिस्तान के क्षेत्र में स्थित था और यह विश्व के प्राचीनतम शिक्षा केंद्रों में से एक था। यह 6वीं सदी ईसा पूर्व से 5वीं सदी ईस्वी तक सक्रिय रहा। इसकी रणनीतिक अवस्थिति नेRead more
तक्षशिला विश्वविद्यालय: प्राचीन शिक्षा केंद्र और आधुनिक विश्वविद्यालय की तुलना
**1. ऐतिहासिक महत्व
तक्षशिला विश्वविद्यालय, वर्तमान पाकिस्तान के क्षेत्र में स्थित था और यह विश्व के प्राचीनतम शिक्षा केंद्रों में से एक था। यह 6वीं सदी ईसा पूर्व से 5वीं सदी ईस्वी तक सक्रिय रहा। इसकी रणनीतिक अवस्थिति ने इसे व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्गों का प्रमुख केंद्र बना दिया, जिससे यह विद्वानों के लिए एक प्रमुख स्थल बन गया। यहाँ चरक और पाणिनि जैसे महान विद्वान जुड़े थे।
**2. पाठ्यक्रम और विषय
तक्षशिला का पाठ्यक्रम चिकित्सा, कानून, और दर्शन जैसे विविध विषयों को शामिल करता था, और यह विभिन्न ज्ञान परंपराओं का संगम था। हालांकि, इसमें आधुनिक विश्वविद्यालयों की तरह कोई मानकीकृत पाठ्यक्रम, डिग्री, या औपचारिक प्रशासनिक ढांचा नहीं था।
**3. नालंदा की तुलना
नालंदा विश्वविद्यालय (5वीं सदी ईस्वी – 1197 ईस्वी) एक और महत्वपूर्ण प्राचीन शिक्षा केंद्र था। नालंदा में एक व्यवस्थित शिक्षा प्रणाली, आवासीय सुविधाएं, और परीक्षा प्रणाली थी, जो इसे आधुनिक विश्वविद्यालयों के आदर्श के रूप में प्रस्तुत करता है।
**4. हालिया खोजें और विरासत
हाल ही की पुरातात्त्विक खोजों ने तक्षशिला के शैक्षिक अभ्यास और संरचना के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान की हैं। फिर भी, तक्षशिला की कीर्ति इसकी रणनीतिक स्थिति और विद्वानों के योगदान के कारण थी, न कि औपचारिक शैक्षिक प्रणाली के कारण।
संक्षेप में, तक्षशिला एक प्रमुख प्राचीन शिक्षण केंद्र था, लेकिन इसकी संरचना और शैक्षिक प्रणाली की कमी के कारण इसे आधुनिक विश्वविद्यालयों के मानक पर नहीं लाया जा सकता।
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