विश्व व्यापार में संरक्षणबाद और मुद्रा चालबाजियों की हाल की परिघटनाएँ भारत की समष्टि-आर्थिक स्थिरता को किस प्रकार से प्रभावित करेंगी? (250 words) [UPSC 2018]
विनिर्माण क्षेत्र की श्रम-प्रधान निर्यातों के लक्ष्य में विफलता के कारण: **1. अपर्याप्त अवसंरचना और प्रौद्योगिकी: आधुनिकता की कमी: कई विनिर्माण इकाइयों में आधुनिक प्रौद्योगिकी और अवसंरचना की कमी है, जो श्रम-प्रधान उद्योगों की उत्पादकता को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए, भारतीय वस्त्र उद्योग पुरानेRead more
विनिर्माण क्षेत्र की श्रम-प्रधान निर्यातों के लक्ष्य में विफलता के कारण:
**1. अपर्याप्त अवसंरचना और प्रौद्योगिकी:
- आधुनिकता की कमी: कई विनिर्माण इकाइयों में आधुनिक प्रौद्योगिकी और अवसंरचना की कमी है, जो श्रम-प्रधान उद्योगों की उत्पादकता को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए, भारतीय वस्त्र उद्योग पुराने मशीनरी और तकनीकों के कारण वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गया है।
**2. उच्च उत्पादन लागत:
- लागत असंगति: उच्च उत्पादन लागत, जिसमें मजदूरी और कच्चे माल की लागत शामिल है, श्रम-प्रधान उत्पादों की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित करती है। जैसे, गारमेंट और फुटवियर उद्योगों में लागत के उच्च स्तर ने निर्यात को सीमित किया है।
**3. सीमित कौशल विकास:
- कौशल की कमी: श्रम-प्रधान उद्योगों की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी है। हालांकि ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना’ (PMKVY) जैसी योजनाएँ हैं, लेकिन इनका विस्तार और सुधार की आवश्यकता है।
श्रम-प्रधान निर्यातों को प्रोत्साहित करने के उपाय:
**1. आधारभूत संरचना में सुधार:
- आधुनिकीकरण: श्रम-प्रधान उद्योगों के लिए अवसंरचना और प्रौद्योगिकी का उन्नयन करें। उदाहरण के लिए, वस्त्र उद्योग में स्मार्ट निर्माण प्रौद्योगिकियों का उपयोग उत्पादकता को बढ़ा सकता है।
**2. कौशल विकास में सुधार:
- व्यावसायिक प्रशिक्षण: श्रमिकों के कौशल में सुधार के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ाएं और उन्नत करें। ‘राष्ट्रीय अपरेंटिसशिप प्रोत्साहन योजना’ (NAPS) जैसे कार्यक्रमों का विस्तार किया जा सकता है।
**3. नीति समर्थन और प्रोत्साहन:
- सरकारी प्रोत्साहन: श्रम-प्रधान निर्यातों को समर्थन देने के लिए सब्सिडी और प्रोत्साहन प्रदान करें। उदाहरण के लिए, ‘मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स फ्रॉम इंडिया स्कीम’ (MEIS) को श्रम-प्रधान उद्योगों के लिए अनुकूलित किया जा सकता है।
**4. नवाचार और डिज़ाइन पर ध्यान:
- डिज़ाइन में सुधार: श्रम-प्रधान उद्योगों में नवाचार और डिज़ाइन सुधार को प्रोत्साहित करें ताकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में विशिष्ट उत्पाद विकसित किए जा सकें।
इन उपायों को अपनाकर भारत श्रम-प्रधान निर्यातों को बढ़ावा दे सकता है और इस क्षेत्र में बेहतर विकास हासिल कर सकता है।
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विश्व व्यापार में संरक्षणवाद और मुद्रा चालबाजियों का भारत की समष्टि-आर्थिक स्थिरता पर प्रभाव परिचय हाल की परिघटनाएँ जैसे संरक्षणवाद और मुद्रा चालबाजियाँ वैश्विक व्यापार में गहरा असर डाल रही हैं, जो भारत की समष्टि-आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं। संरक्षणवाद व्यापार अवरोध संरक्षणवाद के अंतर्गतRead more
विश्व व्यापार में संरक्षणवाद और मुद्रा चालबाजियों का भारत की समष्टि-आर्थिक स्थिरता पर प्रभाव
परिचय
हाल की परिघटनाएँ जैसे संरक्षणवाद और मुद्रा चालबाजियाँ वैश्विक व्यापार में गहरा असर डाल रही हैं, जो भारत की समष्टि-आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।
संरक्षणवाद
संरक्षणवाद के अंतर्गत व्यापार अवरोध जैसे कि शुल्क और आयात कोटा बढ़ाए जाते हैं। इससे भारत को आयातित वस्तुओं और कच्चे माल की लागत बढ़ सकती है। उदाहरण के लिए, अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के दौरान लगाए गए शुल्कों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित किया और भारत के निर्माताओं पर लागत का बोझ डाला।
प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में संरक्षणवादी नीतियाँ भारतीय निर्यात पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं। भारत के वस्त्र उद्योग को कई देशों द्वारा एंटी-डंपिंग शुल्कों का सामना करना पड़ा, जिससे निर्यात की मात्रा और आय में कमी आई।
व्यापार की मात्रा में कमी आर्थिक वृद्धि को धीमा कर सकती है। उदाहरण के लिए, यदि प्रमुख बाजार संरक्षणवादी उपाय अपनाते हैं, तो यह भारतीय सामान और सेवाओं की मांग को कम कर सकता है।
मुद्रा चालबाजियाँ
मुद्रा चालबाजियाँ के कारण विनिमय दर में अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है। उदाहरण के लिए, अगर प्रमुख देश अपनी मुद्रा को कृत्रिम रूप से कम करते हैं, तो इससे भारतीय रुपए की मूल्यवर्ग में अस्थिरता आ सकती है, जिससे निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता और आयात की लागत प्रभावित हो सकती है।
रुपये की कमजोरी से मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। उदाहरण के लिए, आयातित कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से घरेलू ईंधन की कीमतें ऊंची हो सकती हैं, जिससे जीवनयापन की लागत पर असर पड़ेगा।
मुद्रा अस्थिरता पूंजी प्रवाह को भी प्रभावित कर सकती है। मुद्रा अस्थिरता के चलते निवेशक असुरक्षित महसूस कर सकते हैं, जिससे विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और पोर्टफोलियो निवेश में कमी आ सकती है।
हालिया उदाहरण
निष्कर्ष
See lessसंरक्षणवाद और मुद्रा चालबाजियाँ भारत की समष्टि-आर्थिक स्थिरता पर विभिन्न तरीकों से प्रभाव डालती हैं, जैसे व्यापार की मात्रा, मुद्रास्फीति, और पूंजी प्रवाह। भारत के नीति निर्माता इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए प्रभावी व्यापार और मुद्रा प्रबंधन नीतियाँ अपनाकर समृद्धि सुनिश्चित कर सकते हैं।