प्रश्न का उत्तर अधिकतम 15 से 20 शब्दों में दीजिए। यह प्रश्न 03 अंक का है। [MPPSC 2023] रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डी० आर० डी० ओ०) का उद्देश्य क्या है?
भारत में नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी की संवृद्धि और विकास 1. प्रारंभिक विकास और प्रमुख मील के पत्थर: **1. स्थापना और प्रारंभिक कदम: 1948: भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) की स्थापना के साथ नाभिकीय विज्ञान में भारत की यात्रा शुरू हुई। 1962: अप्सरा, भारत का पहला स्वदेशी परमाणु रियेक्टर, बंबई परमाणुRead more
भारत में नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी की संवृद्धि और विकास
1. प्रारंभिक विकास और प्रमुख मील के पत्थर:
**1. स्थापना और प्रारंभिक कदम:
- 1948: भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) की स्थापना के साथ नाभिकीय विज्ञान में भारत की यात्रा शुरू हुई।
- 1962: अप्सरा, भारत का पहला स्वदेशी परमाणु रियेक्टर, बंबई परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) में चालू हुआ।
**2. नाभिकीय प्रौद्योगिकी में उन्नति:
- 1974: भारत ने ऑपरेशन स्माइलींग बुद्धा के तहत अपना पहला परमाणु परीक्षण किया, जो नाभिकीय प्रौद्योगिकी में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।
- 1980s: भारत ने तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की शुरुआत की, जो थोरियम पर आधारित था, भारत के समृद्ध थोरियम संसाधनों का लाभ उठाने के लिए।
**3. हालिया विकास:
- 2008: भारत-अमेरिका नागरिक परमाणु समझौते ने अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और परमाणु तकनीक और ईंधन तक पहुंच के अवसर प्रदान किए।
- 2010s: कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र जैसी नई परमाणु ऊर्जा परियोजनाएं चालू की गईं, जो 2013 से परिचालन में हैं।
भारत में तीव्र प्रजनक रियेक्टर कार्यक्रम के लाभ
**1. ईंधन दक्षता में सुधार:
- पुनरावर्तन और स्थिरता: तीव्र प्रजनक रियेक्टर (FBRs) प्लूटोनियम और थोरियम का उपयोग करते हैं, जो अधिक फिसाइल सामग्री उत्पन्न करते हैं। यह नाभिकीय ईंधन संसाधनों की दीर्घकालिक उपलब्धता को बढ़ाता है।
**2. थोरियम का उपयोग:
- दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा: भारत के FBR कार्यक्रम ने थोरियम के समृद्ध भंडार का उपयोग करने पर ध्यान केंद्रित किया है। प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रियेक्टर (PFBR), जो कपालककम में निर्माणाधीन है, भारत को यूरेनियम आधारित सिस्टम से थोरियम आधारित सिस्टम की ओर ले जाएगा।
**3. रेडियोधर्मी कचरे में कमी:
- कचरा प्रबंधन: FBRs पारंपरिक रियेक्टर्स की तुलना में कम दीर्घकालिक रेडियोधर्मी कचरा उत्पन्न करते हैं, जिससे बेहतर कचरा प्रबंधन और स्थिरता को बढ़ावा मिलता है।
**4. ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि:
- ऊर्जा घनत्व: FBRs अपेक्षाकृत कम ईंधन मात्रा से उच्च ऊर्जा उत्पादन की पेशकश करते हैं, जो एक मजबूत और कुशल ऊर्जा उत्पादन प्रणाली में योगदान करता है।
हालिया उदाहरण:
- कपालककम प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रियेक्टर (PFBR): PFBR भारत के FBR कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो व्यापक पैमाने पर फास्ट ब्रीडर रियेक्टरों की तकनीक को प्रदर्शित और उन्नत करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
निष्कर्ष:
- भारत ने नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी में महत्वपूर्ण प्रगति की है, प्रारंभिक अनुसंधान से लेकर एक मजबूत परमाणु ऊर्जा अवसंरचना की स्थापना तक। तीव्र प्रजनक रियेक्टर कार्यक्रम, जो ईंधन दक्षता में सुधार, थोरियम का उपयोग, और कचरे में कमी की संभावनाओं के साथ, भारत के लिए दीर्घकालिक और सतत नाभिकीय ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डी० आर० डी० ओ०) का उद्देश्य रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) का मुख्य उद्देश्य भारत की रक्षा प्रणालियों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना और भारतीय सशस्त्र बलों की आवश्यकता के अनुसार रक्षा प्रौद्योगिकियों का विकास करना है। DRDO की स्थापना 1958 में की गई थी और तब से यRead more
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डी० आर० डी० ओ०) का उद्देश्य
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) का मुख्य उद्देश्य भारत की रक्षा प्रणालियों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना और भारतीय सशस्त्र बलों की आवश्यकता के अनुसार रक्षा प्रौद्योगिकियों का विकास करना है। DRDO की स्थापना 1958 में की गई थी और तब से यह भारत की रक्षा क्षमताओं को मज़बूत बनाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसके माध्यम से, भारत उन्नत सैन्य तकनीकों के विकास और स्वदेशी रक्षा उत्पादों के निर्माण में आत्मनिर्भर बन रहा है।
मुख्य उद्देश्य:
DRDO का मुख्य लक्ष्य स्वदेशी तकनीकों का विकास कर विदेशी आयातों पर निर्भरता को कम करना है। यह भारत सरकार की “आत्मनिर्भर भारत” पहल के साथ जुड़ा हुआ है, जो घरेलू उत्पादन और अनुसंधान को प्राथमिकता देता है। उदाहरण के लिए, हल्का लड़ाकू विमान (LCA) तेजस DRDO की स्वदेशी रक्षा विकास की सफलता का प्रतीक है।
DRDO के द्वारा विकसित की गई अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियां भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को मज़बूती प्रदान करती हैं। हाल ही में, अग्नि-V इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) का सफल परीक्षण, जिसकी रेंज 5,000 किलोमीटर से अधिक है, भारत की रक्षा क्षमता और रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है।
DRDO मिसाइल, रडार, विमानों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों, और रक्षा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी प्रौद्योगिकियों का विकास करता है। 2023 में, DRDO ने हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर व्हीकल (HSTDV) का सफल परीक्षण किया, जिससे भारत हाइपरसोनिक हथियार विकसित करने में सक्षम देशों की सूची में शामिल हो गया है।
DRDO भारतीय सेना, नौसेना, और वायुसेना को नवीनतम तकनीकों से लैस करता है। उदाहरण के लिए, हाल ही में DRDO द्वारा विकसित एडवांस टोव्ड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) को भारतीय सेना में शामिल किया गया, जो पूरी तरह से स्वदेशी तोपखाने प्रणाली है और सेना की मारक क्षमता को बढ़ाता है।
DRDO उद्योगों और शैक्षणिक संस्थानों के साथ सहयोग करता है ताकि अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा दिया जा सके। 2023 में शुरू की गई डिफेंस इंडिया स्टार्टअप चैलेंज (DISC) एक महत्वपूर्ण पहल है जिसके अंतर्गत DRDO ने स्टार्टअप्स के साथ साझेदारी की और नई रक्षा तकनीकों के विकास को प्रोत्साहित किया।
DRDO अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों के माध्यम से तकनीकी हस्तांतरण और सह-विकास पर भी ध्यान देता है। इसका हालिया उदाहरण ब्रह्मोस मिसाइल का रूस के साथ संयुक्त विकास है, जो भारत की रक्षा निर्यात क्षमताओं को भी बढ़ाता है।
निष्कर्ष
DRDO का उद्देश्य कई आयामों में फैला हुआ है: रक्षा तकनीकों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना, राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ बनाना, और सशस्त्र बलों की क्षमताओं को उन्नत करना। नवाचार, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, और उद्योगों के साथ साझेदारी के माध्यम से, DRDO भारत की रक्षा क्षमताओं को वैश्विक स्तर पर उभारने का कार्य कर रहा है। हाल के महत्वपूर्ण तकनीकी विकास जैसे INS अरिहंत (परमाणु पनडुब्बी) और अस्त्र मिसाइल प्रणाली इसके उदाहरण हैं।
ये प्रयास भारत की व्यापक भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और आत्मनिर्भर भारत जैसी नीतियों के अनुरूप हैं।
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