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भारत में निर्धनता की माप कैसे की जाती है? भारत में ग्रामीण निर्धनता दूर करने के लिए उठाये गये कदमों का वर्णन कीजिये। (125 Words) [UPPSC 2019]
भारत में निर्धनता की माप और ग्रामीण निर्धनता दूर करने के कदम 1. निर्धनता की माप: निर्धनता रेखा: भारत में निर्धनता की माप आय और उपभोग के आधार पर की जाती है। तेंदुलकर समिति (2009) और रंगराजन समिति (2014) ने निर्धनता रेखा को अद्यतन किया है, जो यह निर्धारित करती है कि व्यक्ति या परिवार कितनी आय पर निर्धRead more
भारत में निर्धनता की माप और ग्रामीण निर्धनता दूर करने के कदम
1. निर्धनता की माप:
2. ग्रामीण निर्धनता दूर करने के कदम:
निष्कर्ष: भारत निर्धनता को आय-आधारित मापदंडों और सर्वेक्षणों के माध्यम से मापता है। ग्रामीण निर्धनता दूर करने के लिए रोजगार गारंटी, आवास योजनाएँ और आत्मनिर्भरता कार्यक्रम जैसे उपाय उठाए गए हैं।
See lessलघु एवं सीमान्त किसानों पर हरित क्रांति के प्रभावों की व्याख्या करें। (125 Words) [UPPSC 2019]
लघु एवं सीमान्त किसानों पर हरित क्रांति के प्रभाव **1. सकारात्मक प्रभाव: उत्पादकता में वृद्धि: हरित क्रांति ने उच्च-उपज वाली फसलों और आधुनिक कृषि तकनीकों को पेश किया, जिससे फसल की उत्पादकता बढ़ी। इससे कुछ लघु किसान भी लाभान्वित हुए, जिन्होंने नई किस्मों और बेहतर सिंचाई सुविधाओं का उपयोग किया। आर्थिकRead more
लघु एवं सीमान्त किसानों पर हरित क्रांति के प्रभाव
**1. सकारात्मक प्रभाव:
**2. नकारात्मक प्रभाव:
**3. हाल के उदाहरण:
निष्कर्ष: हरित क्रांति ने कुछ लघु किसानों के लिए लाभकारी परिणाम दिए, लेकिन असमान संसाधनों के कारण कई सीमान्त किसान पर्यावरणीय और आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
See lessसमावेशी विकास' से आप क्या समझते है? भारत में असमानताओं एवं गरीबी को कम करने में समावेशी विकास किस प्रकार सहायक है? समझाइए। (125 Words) [UPPSC 2019]
समावेशी विकास: परिभाषा और प्रभाव **1. समावेशी विकास की परिभाषा: सभी वर्गों के लिए समान अवसर: समावेशी विकास का तात्पर्य आर्थिक प्रगति से है जो समाज के सभी हिस्सों को लाभ पहुंचाती है, जिससे गरीबी और असमानताओं को कम किया जा सके। **2. गरीबी में कमी: स्वरोजगार के अवसर: प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) जैRead more
समावेशी विकास: परिभाषा और प्रभाव
**1. समावेशी विकास की परिभाषा:
**2. गरीबी में कमी:
**3. असमानताओं में कमी:
**4. हाल के उदाहरण:
निष्कर्ष: समावेशी विकास आर्थिक लाभों को समाज के सभी वर्गों तक पहुँचाने में सहायक है, जो गरीबी और असमानताओं को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
See lessव्यापार, रोजगार, विशेषकर महिला रोजगार, आय और संपत्ति वितरण की समानता आदि पर वैश्वीकरण के प्रभाव की विवेचना कीजिये। (200 Words) [UPPSC 2020]
वैश्वीकरण के व्यापार, रोजगार और आय-संपत्ति वितरण पर प्रभाव 1. व्यापार वैश्वीकरण ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में बाजार की पहुंच और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया है। मुक्त व्यापार समझौतों और वाणिज्यिक उदारीकरण के माध्यम से वैश्विक बाजारों तक पहुंच आसान हुई है। उदाहरण के लिए, क्षेत्रीय समग्र आर्थिक साझेदारी (RCRead more
वैश्वीकरण के व्यापार, रोजगार और आय-संपत्ति वितरण पर प्रभाव
1. व्यापार
वैश्वीकरण ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में बाजार की पहुंच और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया है। मुक्त व्यापार समझौतों और वाणिज्यिक उदारीकरण के माध्यम से वैश्विक बाजारों तक पहुंच आसान हुई है। उदाहरण के लिए, क्षेत्रीय समग्र आर्थिक साझेदारी (RCEP) ने सदस्य देशों के बीच व्यापार प्रवाह को बढ़ावा दिया है। हालांकि, यह घरेलू उद्योगों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है, विशेषकर उन उद्योगों पर जो प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं कर सकते।
2. रोजगार
वैश्वीकरण ने नई नौकरियों और उद्योगों को जन्म दिया है। भारत में, आईटी और सेवा क्षेत्र ने वैश्विक आउटसोर्सिंग के कारण महत्वपूर्ण वृद्धि देखी है। फिर भी, यह नौकरी विस्थापन का कारण भी बन सकता है, विशेषकर पारंपरिक क्षेत्रों जैसे कृषि और विनिर्माण में, जहां प्रतिस्पर्धा और प्रौद्योगिकी में प्रगति के कारण नौकरियों की संख्या कम हो रही है।
3. महिला रोजगार
वैश्वीकरण ने महिलाओं के रोजगार के अवसर बढ़ाए हैं, जैसे वस्त्र और परिधान उद्योग में महिलाओं की उच्च भागीदारी। लेकिन इसके साथ ही वेतन अंतर और नौकरी की असुरक्षा जैसी समस्याएं भी सामने आई हैं, जहां महिलाओं को अक्सर पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है।
4. आय और संपत्ति वितरण की समानता
वैश्वीकरण ने आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा दिया है, लेकिन इससे आय और संपत्ति का अंतर भी बढ़ा है। विकासशील देशों में, जबकि आर्थिक प्रगति हुई है, लाभ अक्सर असमान रूप से वितरित होते हैं, जिससे आय विषमता बढ़ी है। उदाहरण के लिए, भारत में, शीर्ष 1% की संपत्ति में बड़ी वृद्धि देखी गई है, जबकि निम्न-आय समूहों की औसत आय में वृद्धि सीमित रही है।
सारांश में, वैश्वीकरण ने आर्थिक विकास को प्रोत्साहित किया है और नए अवसर प्रदान किए हैं, लेकिन इससे आय असमानता बढ़ी है और विशेषकर महिलाओं के रोजगार में चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं।
See lessराष्ट्रीय विनिर्माण नीति के उद्देश्य क्या हैं? 'मेक इन इंडिया' तथा 'स्टार्ट अप इंडिया' का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये। (200 Words) [UPPSC 2020]
राष्ट्रीय विनिर्माण नीति के उद्देश्य 1. विनिर्माण जीडीपी में वृद्धि: उद्देश्य: राष्ट्रीय विनिर्माण नीति का उद्देश्य 2025 तक विनिर्माण क्षेत्र के जीडीपी में 25% योगदान बढ़ाना है। वर्तमान में, विनिर्माण का जीडीपी में योगदान लगभग 17% है। 2. रोजगार सृजन: उद्देश्य: युवाओं के लिए रोजगार के अवसर उत्पन्न करRead more
राष्ट्रीय विनिर्माण नीति के उद्देश्य
1. विनिर्माण जीडीपी में वृद्धि:
2. रोजगार सृजन:
3. वैश्विक प्रतिस्पर्धा:
4. सतत विकास:
‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्ट अप इंडिया’ का आलोचनात्मक मूल्यांकन
1. मेक इन इंडिया:
2. स्टार्ट अप इंडिया:
निष्कर्ष: ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्ट अप इंडिया’ दोनों ही भारत के विनिर्माण और उद्यमिता पारिस्थितिकी तंत्र को सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, इनकी सफलता निर्भर करती है मौजूदा चुनौतियों को दूर करने और प्रभावी कार्यान्वयन पर।
See lessगरीबी की रेखा' से क्या अभिप्राय है? भारत में 'गरीकी निवारण' के लिये चालू किये गये कार्यक्रम समझाइये। (200 Words) [UPPSC 2020]
गरीबी की रेखा और भारत में गरीबी निवारण कार्यक्रम गरीबी की रेखा से अभिप्राय: परिभाषा: गरीबी की रेखा (Poverty Line) एक आर्थिक मानक है, जिसे निर्धारण करने के लिए उपयोग किया जाता है कि कोई व्यक्ति या परिवार कितनी न्यूनतम आय या संसाधनों के साथ जीवन जी रहा है। यह रेखा यह तय करती है कि कौन लोग गरीबी में हैRead more
गरीबी की रेखा और भारत में गरीबी निवारण कार्यक्रम
गरीबी की रेखा से अभिप्राय:
भारत में गरीबी निवारण कार्यक्रम:
इन कार्यक्रमों का उद्देश्य गरीबों के जीवन स्तर को सुधारना और सामाजिक-आर्थिक असमानता को कम करना है। इनके प्रभावी कार्यान्वयन से गरीबी में कमी और सामाजिक कल्याण में सुधार हो सकता है।
See lessभारत में गरीबी और असमानता को कम करने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं? (200 Words) [UPPSC 2020]
भारत में गरीबी और असमानता को कम करने में प्रमुख चुनौतियाँ आर्थिक असमानता: संबंध: भारत में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक अंतर बढ़ रहा है, जिससे गरीबी और असमानता में वृद्धि हो रही है। 2023 के आर्थिक सर्वेक्षण में यह दर्शाया गया कि शीर्ष 10% लोग राष्ट्रीय आय का बड़ा हिस्सा कमा रहे हैं, जबकि निचले 50% का हRead more
भारत में गरीबी और असमानता को कम करने में प्रमुख चुनौतियाँ
इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए समन्वित प्रयासों, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक योजनाओं, और सामाजिक न्याय के सुधार की आवश्यकता है।
See lessए-सी.एन.जी.' क्या है? इसका विभिन्न उपयोग बताइये। (125 Words) [UPPSC 2020]
ए-सी.एन.जी. (S.CNG): परिभाषा और उपयोग परिभाषा: ए-सी.एन.जी. (S.CNG) का मतलब है सक्शन-कूल्ड कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस। यह कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) का एक विशेष प्रकार है जिसमें गैस को सक्शन के दौरान ठंडा किया जाता है, जिससे प्रदर्शन और ऊर्जा दक्षता में सुधार होता है। विभिन्न उपयोग: 1. ऑटोमोटिव ईंधन: S.CRead more
ए-सी.एन.जी. (S.CNG): परिभाषा और उपयोग
परिभाषा: ए-सी.एन.जी. (S.CNG) का मतलब है सक्शन-कूल्ड कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस। यह कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) का एक विशेष प्रकार है जिसमें गैस को सक्शन के दौरान ठंडा किया जाता है, जिससे प्रदर्शन और ऊर्जा दक्षता में सुधार होता है।
विभिन्न उपयोग:
1. ऑटोमोटिव ईंधन: S.CNG का मुख्य उपयोग वाहनों में ईंधन के रूप में किया जाता है। डेली और मुंबई जैसे शहरों में, CNG वाहनों का उपयोग वायु प्रदूषण कम करने और इंधन लागत घटाने के लिए किया जा रहा है।
2. पावर जनरेशन: S.CNG को स्थिर इंजन में पावर जनरेशन के लिए उपयोग किया जाता है, जैसे कि औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली उत्पादन के लिए।
3. औद्योगिक उपयोग: यह औद्योगिक प्रक्रियाओं में भी उपयोग होता है जहां साफ और स्थिर ईंधन की आवश्यकता होती है, जिससे पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है।
निष्कर्ष: S.CNG ईंधन दक्षता और पर्यावरणीय लाभ को बढ़ाता है, और इसका उपयोग वाहनों, पावर जनरेशन, और औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है।
See lessभारत में कृषि उत्पादकता में कमी के क्या कारण हैं? (125 Words) [UPPSC 2020]
भारत में कृषि उत्पादकता की कमी के कारण 1. सिंचाई की कमी: असंतुलित सिंचाई सुविधाएं और मॉनसून पर निर्भरता कृषि उत्पादकता को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए, Vidarbha में सूखा की समस्याएं कृषि उत्पादन को प्रभावित करती हैं। 2. प्रौद्योगिकी की कमी: पुरानी कृषि तकनीकें और मशीनरी की कमी से उत्पादकता में कRead more
भारत में कृषि उत्पादकता की कमी के कारण
1. सिंचाई की कमी: असंतुलित सिंचाई सुविधाएं और मॉनसून पर निर्भरता कृषि उत्पादकता को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए, Vidarbha में सूखा की समस्याएं कृषि उत्पादन को प्रभावित करती हैं।
2. प्रौद्योगिकी की कमी: पुरानी कृषि तकनीकें और मशीनरी की कमी से उत्पादकता में कमी होती है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत सुधार प्रयास जारी हैं, लेकिन प्रौद्योगिकी का प्रयोग कम है।
3. मिट्टी की गुणवत्ता: अधिक उर्वरक उपयोग और मिट्टी की गुणवत्ता में कमी के कारण, उत्पादकता में गिरावट आती है। स्वस्थ मिट्टी प्रबंधन योजनाएं जैसे प्रधानमंत्री कृष्ण सिंचाई योजना का ध्यान इस पर है।
4. छोटे और बंटे हुए खेत: छोटे खेत और भूमि का विभाजन फसलों के मात्रात्मक लाभ और प्रबंधन में कठिनाइयाँ उत्पन्न करता है।
सारांश: सिंचाई की कमी, प्रौद्योगिकी की कमी, मिट्टी की गुणवत्ता और भूमि का विभाजन मुख्य कारण हैं जो भारत में कृषि उत्पादकता को प्रभावित करते हैं।
See less"भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग विकसित देशों की गति के साथ नहीं बढ़ा है।" इसकी व्याख्या कीजिये। (125 Words) [UPPSC 2020]
भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की वृद्धि में रुकावटें 1. अवसंरचना की कमी: कूलिंग और कोल्ड चेन के कमजोर संरचना के कारण, भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग पारंपरिक तरीके पर निर्भर रहता है। इसका उदाहरण है, संगठित फूड प्रोसेसिंग पार्कों की कमी। 2. निवेश की कमी: निजी निवेश और अनुसंधान एवं विकास में कमी है,Read more
भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की वृद्धि में रुकावटें
1. अवसंरचना की कमी: कूलिंग और कोल्ड चेन के कमजोर संरचना के कारण, भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग पारंपरिक तरीके पर निर्भर रहता है। इसका उदाहरण है, संगठित फूड प्रोसेसिंग पार्कों की कमी।
2. निवेश की कमी: निजी निवेश और अनुसंधान एवं विकास में कमी है, जो उद्योग के आधुनिकीकरण और विस्तार में बाधक है।
3. नियामक चुनौतियाँ: जटिल नियामक ढाँचा और लंबी प्रक्रिया व्यापार में लचीलापन की कमी और प्रभावशीलता की कमी का कारण बनती है।
हालिया उदाहरण: हाल ही में प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (PMKSY) जैसे सरकारी प्रयास खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को संवृद्धि देने की दिशा में प्रयासरत हैं। इसके बावजूद, अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत को पीछे रहना पड़ रहा है।
सारांश: भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की वृद्धि में संरचनात्मक, निवेश सम्बंधी, और नियामक चुनौतियाँ प्रमुख बाधाएँ हैं।
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