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इसकी स्पष्ट स्वीकृति है कि विशेष आर्थिक ज़ोन (एस.इ. जैड.) औद्योगिक विकास, विनिर्माण और निर्यातों के एक साधन हैं। इस संभाव्यता को मान्यता देते हुए, एस.ई.जैड. के संपूर्ण करणत्व में वृद्धि करने की आवश्यकता है। कराधान, नियंत्रक कानूनों और प्रशासन के संबंध में एस.ई. जैडों. की सफलता को परेशान करने वाले मुद्दों पर चर्चा कीजिए । (200 words) [UPSC 2015]
विशेष आर्थिक ज़ोन (एस.ई.जेड.) की सफलता के मुद्दे: कराधान, नियंत्रक कानून और प्रशासन परिचय विशेष आर्थिक ज़ोन (एस.ई.जेड.) औद्योगिक विकास, विनिर्माण और निर्यात के लिए महत्वपूर्ण उपकरण हैं। हालांकि, इनकी सफलता कुछ प्रमुख मुद्दों के कारण प्रभावित हो रही है। कराधान संबंधित मुद्दे जटिल कराधान संरचना: एस.ई.Read more
विशेष आर्थिक ज़ोन (एस.ई.जेड.) की सफलता के मुद्दे: कराधान, नियंत्रक कानून और प्रशासन
परिचय विशेष आर्थिक ज़ोन (एस.ई.जेड.) औद्योगिक विकास, विनिर्माण और निर्यात के लिए महत्वपूर्ण उपकरण हैं। हालांकि, इनकी सफलता कुछ प्रमुख मुद्दों के कारण प्रभावित हो रही है।
कराधान संबंधित मुद्दे
नियंत्रक कानूनों के मुद्दे
प्रशासनिक मुद्दे
निष्कर्ष एस.ई.जेड. की सफलता के लिए कराधान प्रणाली की पुनरावृत्ति, नियंत्रक कानूनों में स्पष्टता और प्रशासनिक दक्षता में सुधार आवश्यक है। इन मुद्दों को सुलझाकर एस.ई.जेड. को औद्योगिक विकास और निर्यात में अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
See lessबड़ी परियोजनाओं के नियोजन के समय मानव बस्तियों का पुनर्वास एक महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिक संघात है, जिस पर सदैव विवाद होता है। विकास की बड़ी परियोजनाओं के प्रस्ताव के समय इस संघात को कम करने के लिए सुझाए गए उपायों पर चर्चा कीजिए। (200 words) [UPSC 2016]
मानव बस्तियों का पुनर्वास: विवाद और समाधान परिचय बड़ी परियोजनाओं के नियोजन के दौरान मानव बस्तियों का पुनर्वास एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक संघात होता है, जो अक्सर विवाद का कारण बनता है। इस संघात को कम करने के लिए प्रभावी उपायों की आवश्यकता होती है। उपाय सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन: परियोजना से पूर्व व्यापRead more
मानव बस्तियों का पुनर्वास: विवाद और समाधान
परिचय बड़ी परियोजनाओं के नियोजन के दौरान मानव बस्तियों का पुनर्वास एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक संघात होता है, जो अक्सर विवाद का कारण बनता है। इस संघात को कम करने के लिए प्रभावी उपायों की आवश्यकता होती है।
उपाय
निष्कर्ष मानव बस्तियों के पुनर्वास के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को कम करने के लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, जिसमें गहन मूल्यांकन, समुदाय की भागीदारी, और प्रभावी पुनर्वास योजनाएं शामिल हैं।
See lessदेश में नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों के संदर्भ में इनकी वर्तमान स्थिति और प्राप्त किए जाने वाले लक्ष्यों का विवरण दीजिए। प्रकाश उत्सर्जक डायोड (एल० ई० डी०) पर राष्ट्रीय कार्यक्रम के महत्त्व की विवेचना संक्षेप में कीजिए। (200 words) [UPSC 2016]
देश में नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों की वर्तमान स्थिति और प्राप्त किए जाने वाले लक्ष्य भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है, और इसका उद्देश्य 2030 तक 500 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता प्राप्त करना है। वर्तमान में, भारत की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 176 गीगावॉट है, जिसमें प्रमुखRead more
देश में नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों की वर्तमान स्थिति और प्राप्त किए जाने वाले लक्ष्य
भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है, और इसका उद्देश्य 2030 तक 500 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता प्राप्त करना है। वर्तमान में, भारत की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 176 गीगावॉट है, जिसमें प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं:
भारत की सौर ऊर्जा क्षमता लगभग 61 गीगावॉट है। सौर पार्कों और सौर Rooftop परियोजनाओं ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 2023 में, भारत ने 30,000 मेगावॉट की सौर ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य पूरा किया।
भारत की पवन ऊर्जा क्षमता लगभग 42 गीगावॉट है। तमिलनाडु और गुजरात जैसे राज्यों में बड़े पवन ऊर्जा पार्क स्थापित किए गए हैं।
बायोमास और छोटे जलविद्युत परियोजनाएँ मिलाकर लगभग 27 गीगावॉट की क्षमता है।
प्रकाश उत्सर्जक डायोड (LED) पर राष्ट्रीय कार्यक्रम का महत्त्व
प्रकाश उत्सर्जक डायोड (LED) पर राष्ट्रीय कार्यक्रम ने ऊर्जा दक्षता में क्रांति ला दी है। इसके महत्त्व को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
LED बल्ब पारंपरिक इन्कैंडसेंट बल्बों की तुलना में 80% तक अधिक ऊर्जा बचाते हैं। 2019 में, भारत ने लगभग 36 करोड़ LED बल्ब वितरित किए, जिससे बिजली की बचत में योगदान मिला।
LED बल्ब की लंबी उम्र और कम ऊर्जा खपत से लंबे समय तक लागत में कमी आई है। यह गरीब और ग्रामीण इलाकों में ऊर्जा खर्च को कम करने में मदद करता है।
LEDs की कम ऊर्जा खपत और कम कार्बन उत्सर्जन से पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है, जिससे भारत की जलवायु लक्ष्यों की दिशा में प्रगति हुई है।
निष्कर्ष
नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की प्रगति और LED पर राष्ट्रीय कार्यक्रम दोनों ही ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। ये उपाय भारत को सतत विकास की ओर अग्रसर करने में सहायक हैं।
See lessभारतीय कृषि की प्रकृति की अनिश्चितताओं पर निर्भरता के मद्देनज़र, फसल बीमा की आवश्यकता की विवेचना कीजिए और प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना (पी० एम० एफ० बी० वाइ०) की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (200 words) [UPSC 2016]
भारतीय कृषि की प्रकृति की अनिश्चितताओं पर निर्भरता के मद्देनज़र फसल बीमा की आवश्यकता भारतीय कृषि मौसम की अनिश्चितताओं जैसे बाढ़, सूखा, और असामयिक वर्षा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। इसलिए, फसल बीमा की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है: वित्तीय सुरक्षा फसल बीमा प्राकृतिक आपदाओं के कRead more
भारतीय कृषि की प्रकृति की अनिश्चितताओं पर निर्भरता के मद्देनज़र फसल बीमा की आवश्यकता
भारतीय कृषि मौसम की अनिश्चितताओं जैसे बाढ़, सूखा, और असामयिक वर्षा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। इसलिए, फसल बीमा की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है:
फसल बीमा प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल की हानि से वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान को कम करने में मदद मिलती है। 2020 के असामयिक वर्षा के दौरान फसल बीमा ने प्रभावित किसानों को राहत प्रदान की।
बीमा किसानों को जोखिम प्रबंधन में सहायता करता है, जिससे वे नई प्रौद्योगिकियों और कृषि पद्धतियों में निवेश कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, 2022 के पंजाब में बर्फबारी के बाद बीमा कवरेज ने किसानों की मदद की।
फसल बीमा से आय स्थिरता बनी रहती है, और आपदा के बाद भी कृषि गतिविधियां जारी रहती हैं।
प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना (पी.एम.एफ.बी.वाई.) की मुख्य विशेषताएँ
प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) को 2016 में लॉन्च किया गया, और इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
PMFBY प्राकृतिक आपदाओं, कीटों, और रोगों के कारण होने वाली फसल हानि को कवर करता है। 2021 में महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में इस योजना के तहत मुआवजा प्रदान किया गया।
किसानों को कम प्रीमियम देना होता है, जबकि सरकार बाकी की लागत का भुगतान करती है। उदाहरण के लिए, किसानों को खरीफ फसलों के लिए केवल 1.5% प्रीमियम देना होता है।
योजना में टेक्नोलॉजी का उपयोग किया गया है, जैसे सैटेलाइट इमेजरी और ड्रोन तकनीक, जिससे दावे की प्रक्रिया सरल और तेजी से की जाती है।
PMFBY पारदर्शिता और आसान पहुँच पर जोर देती है, विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों को लक्षित करती है।
निष्कर्ष
फसल बीमा भारतीय कृषि में प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए आवश्यक है। PMFBY इसके लिए एक समग्र और प्रभावी योजना प्रदान करती है, जो किसानों को वित्तीय सुरक्षा, जोखिम प्रबंधन, और आय स्थिरता प्रदान करती है।
See lessभारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में एफ० डी० आइ० की आवश्यकता की पुष्टि कीजिए। हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापनों तथा वास्तविक एफ० डी० आइ० के बीच अन्तर क्यों है? भारत में वास्तविक एफ० डी० आइ० को बढ़ाने के लिए सुधारात्मक कदम सुझाइए। (200 words) [UPSC 2016]
भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में एफ.डी.आई. की आवश्यकता विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफ.डी.आई.) भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है: पूंजी प्रवाह एफ.डी.आई. से पूंजी प्राप्त होती है, जो अवसंरचना परियोजनाओं और औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक है। हाल ही में, गूगल ने ग्रामीन क्षेत्रों मेRead more
भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में एफ.डी.आई. की आवश्यकता
विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफ.डी.आई.) भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है:
एफ.डी.आई. से पूंजी प्राप्त होती है, जो अवसंरचना परियोजनाओं और औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक है। हाल ही में, गूगल ने ग्रामीन क्षेत्रों में डिजिटल अवसंरचना के विकास के लिए निवेश किया है।
एफ.डी.आई. से अधिक उन्नत तकनीक और बेहतर प्रथाएँ मिलती हैं, जो उत्पादकता और दक्षता को बढ़ाती हैं। एप्पल और सैमसंग जैसे कंपनियों ने भारतीय बाजार में उन्नत तकनीक प्रस्तुत की है।
विदेशी निवेश रोजगार के अवसर प्रदान करता है, जो बेरोज़गारी को कम करता है। अमेज़न के विस्तार से लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न हुए हैं।
एफ.डी.आई. आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देता है और निर्यात संभावनाएँ बढ़ाता है। ह्यूंदै और टोयोटा जैसी कंपनियाँ भारत के निर्यात आंकड़ों में योगदान कर रही हैं।
हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापनों तथा वास्तविक एफ.डी.आई. के बीच अन्तर
जटिल और कठिन नियम और प्रशासनिक बाधाएँ निवेशकों को हतोत्साहित करती हैं। नीति में बदलाव और ब्यूरोक्रेटिक देरी से निवेश में देरी होती है।
अवसंरचना की कमी, जैसे ऊर्जा की कमी और लॉजिस्टिक्स समस्याएँ, परियोजनाओं के सफल कार्यान्वयन में बाधक बनती हैं।
राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक अनिश्चितताएँ निवेशकों को असंवेदनशील बना सकती हैं।
वास्तविक एफ.डी.आई. को बढ़ाने के लिए सुधारात्मक कदम
नियमों और विनियमों को सरल और पारदर्शी बनाएं। सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम लागू करने से प्रशासनिक बाधाएँ कम की जा सकती हैं।
ऊर्जा, परिवहन, और लॉजिस्टिक्स जैसे अवसंरचनात्मक सुधारों में निवेश करें, जिससे परियोजनाओं का कार्यान्वयन आसान हो सके।
राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक पारदर्शिता सुनिश्चित करें। नीति रूपरेखाएँ स्पष्ट और स्थिर होनी चाहिए ताकि निवेशकों को विश्वास हो।
निवेशकों को आकर्षित करने के लिए डिप्लोमेटिक चैनल और निवेश सम्मेलनों के माध्यम से भारत को प्रोत्साहित करें। मेक इन इंडिया जैसे अभियानों के माध्यम से विदेशी निवेश को बढ़ावा दें।
निष्कर्ष
एफ.डी.आई. भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। नियमों, अवसंरचना, और स्थिरता में सुधार कर वास्तविक एफ.डी.आई. को बढ़ावा दिया जा सकता है, जिससे निवेश का वातावरण और अधिक अनुकूल बनेगा।
See lessरक्षा क्षेत्र में पी.पी.पी. माडल क्या है? (125 Words) [UPPSC 2018]
रक्षा क्षेत्र में पी.पी.पी. (Public-Private Partnership) मॉडल: पी.पी.पी. मॉडल रक्षा क्षेत्र में एक सहयोगात्मक ढांचा है, जिसमें सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर रक्षा संबंधी परियोजनाओं और सेवाओं का निर्माण, संचालन और प्रबंधन करते हैं। मुख्य विशेषताएँ: साझेदारी: निजी कंपनियाँ रक्षा उपकरणों, तकनीकी सेवाओं औRead more
रक्षा क्षेत्र में पी.पी.पी. (Public-Private Partnership) मॉडल:
पी.पी.पी. मॉडल रक्षा क्षेत्र में एक सहयोगात्मक ढांचा है, जिसमें सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर रक्षा संबंधी परियोजनाओं और सेवाओं का निर्माण, संचालन और प्रबंधन करते हैं।
मुख्य विशेषताएँ:
इस मॉडल का उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में संसाधनों की प्रभावशीलता बढ़ाना और नवाचार को प्रोत्साहित करना है।
See less'स्मार्ट शहरों' से क्या तात्पर्य है? भारत के शहरी विकास में इनकी प्रासंगिकता का परीक्षण कीजिए। क्या इससे ग्रामीण तथा शहरी भेदभाव में बढ़ोतरी होगी? पी० यू० आर० ए० एवं आर० यू० आर० बी० ए० एन० मिशन के सन्दर्भ में 'स्मार्ट गाँवों' के लिए तर्क प्रस्तुत कीजिए। (200 words) [UPSC 2016]
स्मार्ट शहर वे शहरी क्षेत्र हैं जो डिजिटल तकनीक और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) का उपयोग करके अपने प्रदर्शन, जीवन की गुणवत्ता और संसाधनों के प्रबंधन में सुधार करते हैं। इसमें स्मार्ट बुनियादी ढाँचा, स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन, ऊर्जा दक्षता और सार्वजनिक सेवाओं की बेहतरी शामिल होती है। उदाहरण केRead more
स्मार्ट शहर वे शहरी क्षेत्र हैं जो डिजिटल तकनीक और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) का उपयोग करके अपने प्रदर्शन, जीवन की गुणवत्ता और संसाधनों के प्रबंधन में सुधार करते हैं। इसमें स्मार्ट बुनियादी ढाँचा, स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन, ऊर्जा दक्षता और सार्वजनिक सेवाओं की बेहतरी शामिल होती है। उदाहरण के लिए, स्मार्ट दिल्ली में ट्रैफिक प्रबंधन के लिए स्मार्ट सिग्नल और ऊर्जा प्रबंधन के लिए सोलर पैनल लगाए गए हैं।
भारत के शहरी विकास में प्रासंगिकता
स्मार्ट शहर सार्वजनिक सेवाओं की दक्षता बढ़ाते हैं, जैसे स्वच्छ जल, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, और सहज परिवहन। स्मार्ट बेंगलुरु ने ट्रैफिक जाम कम करने के लिए स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल लागू किए हैं।
ये हरित प्रौद्योगिकियाँ और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाते हैं, जिससे पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है। अहमदाबाद में सोलर पैनल और इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए गए हैं।
स्मार्ट शहर निवेश और रोजगार के अवसर उत्पन्न करते हैं, जैसे पुणे में आईटी और टेक्नोलॉजी सेक्टर में वृद्धि।
ग्रामीण-शहरी भेदभाव में वृद्धि
स्मार्ट शहरों पर ध्यान केंद्रित करने से ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों और विकास की कमी हो सकती है, जिससे ग्रामीण-शहरी भेदभाव बढ़ सकता है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी कर सकता है।
‘स्मार्ट गाँवों’ के लिए तर्क
पी.यू.आर.ए. का लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराना है, जिससे जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो। स्मार्ट गाँव इन सुविधाओं को बढ़ावा दे सकते हैं और ग्रामीण पलायन को रोक सकते हैं।
आर.यू.आर.बी.एएन मिशन का उद्देश्य सभी सुविधाएँ और आर्थिक विकास को ग्रामीण क्षेत्रों में लाना है। स्मार्ट गाँव इस दृष्टिकोण को आगे बढ़ा सकते हैं और सतत विकास को बढ़ावा दे सकते हैं।
निष्कर्ष
स्मार्ट शहरों का विकास भारत के शहरी क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन स्मार्ट गाँवों को भी उतना ही महत्व देना चाहिए ताकि ग्रामीण-शहरी भेदभाव कम हो सके और सतत विकास संभव हो सके। पी.यू.आर.ए. और आर.यू.आर.बी.एएन मिशन जैसे कार्यक्रम इस प्रक्रिया में सहायक हो सकते हैं।
See less"सुधारोत्तर अवधि में सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) की समग्र संवृद्धि में औद्योगिक संवृद्धि दर पिछड़ती गई है।" कारण बताइए । औद्योगिक नीति में हाल में किए गए परिवर्तन औद्योगिक संवृद्धि दर को बढ़ाने में कहां तक सक्षम हैं ? (250 words) [UPSC 2017]
परिचय सुधारोत्तर अवधि में, भारत में सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) की समग्र संवृद्धि में औद्योगिक संवृद्धि दर पिछड़ती गई है। इस अंतर के पीछे विभिन्न कारण हैं और हाल में किए गए औद्योगिक नीतिगत परिवर्तन इस स्थिति को सुधारने में कितने सक्षम हैं, यह जानना आवश्यक है। औद्योगिक संवृद्धि में पिछड़ने के कारण नRead more
परिचय
सुधारोत्तर अवधि में, भारत में सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) की समग्र संवृद्धि में औद्योगिक संवृद्धि दर पिछड़ती गई है। इस अंतर के पीछे विभिन्न कारण हैं और हाल में किए गए औद्योगिक नीतिगत परिवर्तन इस स्थिति को सुधारने में कितने सक्षम हैं, यह जानना आवश्यक है।
औद्योगिक संवृद्धि में पिछड़ने के कारण
आर्थिक सुधारों के बावजूद, नियमित बाधाएँ और आबकारी कानूनों ने औद्योगिक वृद्धि को प्रभावित किया है। जटिल श्रम कानून और कर नीतियों के कारण व्यावसायिक माहौल को नुकसान हुआ है।
सड़क, ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स जैसी आधारभूत संरचनाओं की कमी ने औद्योगिक दक्षता और प्रतिस्पर्धा को प्रभावित किया है। लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक में भारत की स्थिति कमज़ोर है।
निवेश की कमी और सूक्ष्म और लघु उद्योगों के लिए वित्तीय सुलभता की कमी ने औद्योगिक विस्तार को सीमित किया है। उच्च ब्याज दरें और सख्त ऋण प्रथाएँ इन समस्याओं को बढ़ाती हैं।
भारतीय उद्योगों की तकनीकी उन्नति में धीमापन ने उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित किया है। अनुसंधान और विकास (आर.डी.) पर खर्च अन्य देशों की तुलना में कम है।
हाल के परिवर्तन और उनकी प्रभावशीलता
पी.एल.आई. योजना के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा, और वस्त्र जैसे क्षेत्रों में प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं। इस योजना ने इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में बड़े निवेश को आकर्षित किया है, जिससे रोजगार और तकनीकी प्रगति में सुधार हुआ है।
एन.आई.पी. का लक्ष्य आधारभूत संरचना में सुधार करना है, जिसमें ₹111 लाख करोड़ का निवेश किया जाएगा। इससे लॉजिस्टिक्स लागत में कमी और औद्योगिक दक्षता में सुधार की उम्मीद है।
स्टार्टअप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी पहलों ने नवाचार और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया है। इन नीतियों से औद्योगिक क्षेत्रों में उद्यमिता और विदेशी निवेश में वृद्धि हुई है।
व्यापार करने में आसानी को सुधारने के लिए लागू किए गए सुधार, जैसे कर नियमों को सरल बनाना और अनुपालन बोझ को कम करना, औद्योगिक वातावरण को अनुकूल बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
निष्कर्ष
See lessऔद्योगिक संवृद्धि दर की कमी के कारणों में नीतिगत, आधारभूत संरचना और वित्तीय मुद्दे शामिल हैं। हाल के परिवर्तनों जैसे पी.एल.आई. योजना, एन.आई.पी., और स्टार्टअप इंडिया इन समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हो सकते हैं, अगर इनका प्रभावी ढंग से कार्यान्वयन किया जाए।
भारत में स्वतंत्रता के बाद कृषि में आई विभिन्न प्रकारों की क्रांतियों को स्पष्ट कीजिए। इन क्रांतियों ने भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा में किस प्रकार सहायता प्रदान की है ? (150 words) [UPSC 2017]
परिचय स्वतंत्रता के बाद, भारत में कई कृषि क्रांतियों ने कृषि उत्पादन को बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और गरीबी उन्मूलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन क्रांतियों ने कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों और संसाधनों का उपयोग बढ़ाया, जिससे आत्मनिर्भरता हासिल की गई। कृषि में आई प्रमुख क्रांतियाँ हरित क्रांRead more
परिचय
स्वतंत्रता के बाद, भारत में कई कृषि क्रांतियों ने कृषि उत्पादन को बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और गरीबी उन्मूलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन क्रांतियों ने कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों और संसाधनों का उपयोग बढ़ाया, जिससे आत्मनिर्भरता हासिल की गई।
कृषि में आई प्रमुख क्रांतियाँ
यह क्रांति उच्च उत्पादकता वाले बीजों (HYV), रासायनिक उर्वरकों और सिंचाई प्रौद्योगिकियों पर आधारित थी। पंजाब, हरियाणा, और उत्तर प्रदेश में गेहूं और चावल का उत्पादन बढ़ा, जिससे देश की खाद्य सुरक्षा में सुधार हुआ और अकाल की स्थितियों से बचा गया।
इसे ऑपरेशन फ्लड के नाम से भी जाना जाता है। इसके तहत दूध उत्पादन में वृद्धि की गई और भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बनाया गया। यह ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के अवसर प्रदान करने में सहायक रहा।
यह मत्स्य उत्पादन में वृद्धि लाने के लिए शुरू की गई, जिससे प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ी और तटीय एवं आंतरिक क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़े।
इसका उद्देश्य तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देना था, जिससे सरसों और सूरजमुखी के तेल के उत्पादन में वृद्धि हुई और खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम हुई।
यह मांस और पोल्ट्री उत्पादन में वृद्धि के लिए शुरू की गई, जिससे प्रोटीन की आपूर्ति बढ़ी और निर्यात क्षेत्र को समर्थन मिला।
गरीबी उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव
इन क्रांतियों ने कृषि उत्पादन में वृद्धि कर खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया और रोजगार के अवसरों को बढ़ाकर गरीबी उन्मूलन में मदद की। विशेष रूप से हरित और श्वेत क्रांति ने ग्रामीण क्षेत्रों में आय बढ़ाई और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को सशक्त किया।
निष्कर्ष
See lessइन कृषि क्रांतियों ने भारत को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया और गरीबी उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जी० डी० पी० में विनिर्माण क्षेत्र विशेषकर एम० एस० एम० ई० की बढ़ी हुई हिस्सेदारी तेज आर्थिक संवृद्धि के लिए आवश्यक है। इस संबंध में सरकार की वर्तमान नीतियों पर टिप्पणी कीजिए। (150 words)[UPSC 2023]
परिचय भारत में तेज आर्थिक संवृद्धि के लिए विनिर्माण क्षेत्र, विशेषकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) की जीडीपी में हिस्सेदारी को बढ़ाना आवश्यक है। वर्तमान में भारत के GDP में विनिर्माण का योगदान लगभग 17% है। इसे बढ़ाकर 25% तक ले जाने का लक्ष्य है, जो रोजगार सृजन और समावेशी विकास में सहायक होगा।Read more
परिचय
भारत में तेज आर्थिक संवृद्धि के लिए विनिर्माण क्षेत्र, विशेषकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) की जीडीपी में हिस्सेदारी को बढ़ाना आवश्यक है। वर्तमान में भारत के GDP में विनिर्माण का योगदान लगभग 17% है। इसे बढ़ाकर 25% तक ले जाने का लक्ष्य है, जो रोजगार सृजन और समावेशी विकास में सहायक होगा।
सरकार की नीतियाँ
सरकार ने PLI योजना के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल और कपड़ा जैसे क्षेत्रों में विनिर्माण को प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय सहायता दी है। यह MSMEs को आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनाकर उनके विकास में मदद करता है।
मेक इन इंडिया अभियान का उद्देश्य घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना और एफ़डीआई को आकर्षित करना है। इसके तहत एमएसएमई के लिए नियमों का सरलीकरण और बुनियादी ढांचे में सुधार किए गए हैं, जिससे विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार हो सके।
आत्मनिर्भर भारत पहल का मुख्य उद्देश्य भारत को स्वावलंबी बनाना है। इसके तहत स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा देने और MSMEs को डिजिटल प्रौद्योगिकियों के साथ सशक्त बनाने के लिए सहायता दी जा रही है।
MSMEs को संकट से उबारने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए आपातकालीन क्रेडिट गारंटी योजना (ECLGS) और मुद्रा योजना के तहत वित्तीय सहायता दी जा रही है।
निष्कर्ष
See lessPLI, मेक इन इंडिया, और आत्मनिर्भर भारत जैसी योजनाओं के माध्यम से MSMEs को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो GDP में विनिर्माण की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, बुनियादी ढाँचे और नवाचार में और सुधार की आवश्यकता है।