बैदिक शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिये एवं वर्तमान में इसकी सार्थकता का समीक्षा कीजिये। (200 Words) [UPPSC 2019]
भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में पाश्चात्य प्रभावों का आलोचनात्मक परीक्षण पाश्चात्य प्रभाव: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली का भारत पर प्रभाव ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुआ। विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना, सिलेबस में पश्चिमी विषयों का समावेश, और अंग्रेजी भाषा का प्रचार भारतीय शिक्Read more
भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में पाश्चात्य प्रभावों का आलोचनात्मक परीक्षण
पाश्चात्य प्रभाव: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली का भारत पर प्रभाव ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुआ। विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना, सिलेबस में पश्चिमी विषयों का समावेश, और अंग्रेजी भाषा का प्रचार भारतीय शिक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव लाए।
सकारात्मक प्रभाव
- संविधिक शिक्षा: पाश्चात्य शिक्षा ने वैज्ञानिक सोच, समाजशास्त्र, और गणित जैसे आधुनिक विषयों को भारतीय शिक्षा प्रणाली में शामिल किया। आधुनिक शिक्षा के उदाहरण जैसे कि IITs और IIMs ने वैश्विक स्तर पर भारतीय शिक्षा को मान्यता दिलाई है।
- भाषा और संचार: अंग्रेजी भाषा की शिक्षा ने भारतीय छात्रों को वैश्विक संचार और वेतन के अवसरों का लाभ उठाने में सक्षम बनाया है, जैसे कि सूचना प्रौद्योगिकी और वित्तीय क्षेत्र में अवसर।
नकारात्मक प्रभाव
- संस्कृति का ह्रास: पाश्चात्य शिक्षा ने भारतीय संस्कृति और परंपराओं को कुछ हद तक हानि पहुँचाई है। भारतीय भाषाओं और स्थानीय ज्ञान की अनदेखी की गई है, जिससे संस्कृतिक विविधता की सराहना कम हुई है।
- शिक्षा की असमानता: पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली ने शहरी-ग्रामीण और आर्थिक भेदभाव को बढ़ावा दिया है। महंगी निजी स्कूलों और कॉलेजों ने आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को शिक्षा से वंचित किया है।
हाल के उदाहरण
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP) ने पाश्चात्य प्रभावों की आलोचना की है और भारतीय संस्कृति और मूल्यों को प्राथमिकता देने का प्रयास किया है।
- कृषि शिक्षा और लोकल ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न राज्य सरकारों ने स्थानीय भाषाओं और पारंपरिक ज्ञान को समाविष्ट करने की पहल की है।
निष्कर्ष
पाश्चात्य प्रभावों ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को आधुनिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन इसने कुछ सांस्कृतिक और सामाजिक असमानताओं को भी जन्म दिया है। समावेशी और संतुलित शिक्षा प्रणाली की दिशा में सुधार आवश्यक है।
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बैदिक शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ 1. वेदांत पर आधारित शिक्षा बैदिक शिक्षा व्यवस्था का आधार वेदों और उपनिषदों पर होता था। यह शिक्षा प्रणाली मुख्य रूप से धार्मिक और दार्शनिक विचारों को प्रोत्साहित करती थी, जिनमें ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, और अथर्ववेद शामिल हैं। 2. गुरु-शिष्य परंपरा इस व्यवस्थाRead more
बैदिक शिक्षा व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
1. वेदांत पर आधारित शिक्षा
बैदिक शिक्षा व्यवस्था का आधार वेदों और उपनिषदों पर होता था। यह शिक्षा प्रणाली मुख्य रूप से धार्मिक और दार्शनिक विचारों को प्रोत्साहित करती थी, जिनमें ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, और अथर्ववेद शामिल हैं।
2. गुरु-शिष्य परंपरा
इस व्यवस्था में गुरु-शिष्य परंपरा का प्रमुख स्थान था। शिक्षा का प्रसार गुरुकुलों के माध्यम से होता था, जहां गुरु अपने शिष्यों को शास्त्रों और जीवन की नैतिकताओं की शिक्षा देते थे।
3. जीवन के विभिन्न पहलुओं की शिक्षा
वेदों में केवल धार्मिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र, राजनीति, अध्यात्म, और संगीत जैसे विषयों पर भी ध्यान केंद्रित किया जाता था।
वर्तमान में सार्थकता की समीक्षा
1. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व
वर्तमान में बैदिक शिक्षा व्यवस्था का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व बना हुआ है। यह प्राचीन भारतीय ज्ञान और परंपराओं को संरक्षित करने में सहायक है। हाल ही में आयुष मंत्रालय और सरकारी योजनाएँ वेदों और संस्कृत की शिक्षा को बढ़ावा दे रही हैं।
2. नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा
बैदिक शिक्षा प्रणाली की नैतिकता और आध्यात्मिकता आज भी समाज में प्रासंगिक हैं। उदाहरण के लिए, आत्मसुधार और समाज सेवा के सिद्धांतों को आज भी कई धार्मिक और सामाजिक संगठन अपनाते हैं।
3. शिक्षा में समकालीन प्रभाव
हालांकि, आधुनिक शिक्षा प्रणाली की विभिन्न आवश्यकताएँ हैं, लेकिन गुरु-शिष्य परंपरा और आध्यात्मिक शिक्षा के तत्व आज भी मनोवैज्ञानिक और व्यक्तित्व विकास में मददगार हो सकते हैं।
इस प्रकार, बैदिक शिक्षा प्रणाली का आधुनिक संदर्भ में एक विशेष स्थान है, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
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