क्या भारत सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का प्रबल दावेदार है? इस संबंध में तर्किक उत्तर दीजिये। (200 Words) [UPPSC 2019]
आर्कटिक परिषद की संरचना एवं कार्यकरण 1. संरचना (Structure): स्थापना: आर्कटिक परिषद की स्थापना 1996 में ओटावा घोषणा के माध्यम से हुई थी। इसका उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग और समन्वय को बढ़ावा देना है। सदस्य: परिषद में आठ सदस्य राज्य शामिल हैं: कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे, रूस, स्वीRead more
आर्कटिक परिषद की संरचना एवं कार्यकरण
1. संरचना (Structure):
- स्थापना: आर्कटिक परिषद की स्थापना 1996 में ओटावा घोषणा के माध्यम से हुई थी। इसका उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग और समन्वय को बढ़ावा देना है।
- सदस्य: परिषद में आठ सदस्य राज्य शामिल हैं: कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे, रूस, स्वीडन, और संयुक्त राज्य अमेरिका।
- स्थायी प्रतिभागी: परिषद में छह स्थायी प्रतिभागी भी हैं, जो आर्कटिक स्वदेशी समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जैसे सैमी काउंसिल और इनुइट सर्कम्पोलर काउंसिल, जो निर्णय-प्रक्रियाओं में शामिल होते हैं।
2. कार्य (Functions):
- पर्यावरण संरक्षण: परिषद का मुख्य ध्यान आर्कटिक क्षेत्र के सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण पर है, जैसे जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव विविधता की हानि।
- वैज्ञानिक अनुसंधान: परिषद वैज्ञानिक अनुसंधान और डेटा साझा करने को प्रोत्साहित करती है।
- उदाहरण: 2023 की आर्कटिक परिषद रिपोर्ट ने समुद्री बर्फ के पिघलने के प्रभाव पर प्रकाश डाला, जिसने नए सहयोगात्मक अनुसंधान पहलों को जन्म दिया।
3. कार्यकारी समूह (Working Groups):
- समूह: परिषद के छह कार्यकारी समूह हैं जो विशिष्ट मुद्दों पर काम करते हैं, जैसे आर्कटिक पर्यावरण की रक्षा और आपातकालीन तैयारी।
- उदाहरण: AMAP (आर्कटिक मॉनिटरिंग और आकलन कार्यक्रम) ने 2022 में आर्कटिक वायु प्रदूषण पर एक आकलन जारी किया, जिसने क्षेत्रीय नीतिगत चर्चाओं को प्रभावित किया।
4. अध्यक्षता और बैठकें (Chairmanship and Meetings):
- घूर्णन अध्यक्षता: आर्कटिक परिषद की अध्यक्षता हर दो वर्षों में मेम्बर स्टेट्स के बीच घूर्णन करती है। अध्यक्षता करने वाला देश मंत्रीस्तरीय बैठकें आयोजित करता है जहां महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं।
- उदाहरण: नॉर्वे ने 2019 से 2021 तक अध्यक्षता की, जिसमें सतत विकास और जलवायु परिवर्तन अनुकूलन पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिसमें आर्कटिक जैव विविधता की सुरक्षा के लिए पहलों को शामिल किया गया।
5. चुनौतियाँ और आलोचनाएँ (Challenges and Criticisms):
- भू-राजनीतिक तनाव: परिषद को भू-राजनीतिक तनावों का सामना करना पड़ता है, विशेष रूप से रूस के साथ, जो कुछ मुद्दों पर सहमति तक पहुंचने की क्षमता को प्रभावित करता है।
- उदाहरण: 2022 की मंत्रीस्तरीय बैठक ने पर्यावरणीय समझौतों पर सीमित प्रगति देखी, जो विभिन्न राष्ट्रीय हितों के कारण हुई।
निष्कर्ष: आर्कटिक परिषद आर्कटिक राज्यों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने और क्षेत्रीय मुद्दों को संबोधित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसकी संरचना, जिसमें सदस्य राज्यों और स्वदेशी समूहों दोनों का प्रतिनिधित्व शामिल है, व्यापक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है। हालांकि, भू-राजनीतिक तनाव और विभिन्न राष्ट्रीय हित परिषद की प्रभावशीलता के लिए चुनौतियां प्रस्तुत करते हैं।
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भारत की सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए दावे की समीक्षा **1. भारत का वैश्विक प्रभाव भारत अपनी वृद्धि होती आर्थिक शक्ति और वैश्विक रणनीतिक भूमिका के कारण सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का प्रबल दावेदार है। वर्तमान में, भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनोRead more
भारत की सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए दावे की समीक्षा
**1. भारत का वैश्विक प्रभाव
भारत अपनी वृद्धि होती आर्थिक शक्ति और वैश्विक रणनीतिक भूमिका के कारण सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का प्रबल दावेदार है। वर्तमान में, भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत की सक्रियता संयुक्त राष्ट्र शांति-रक्षा मिशनों में और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाती है। उदाहरण के लिए, भारत ने “वन प्लानेट समिट” में जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की है।
**2. अन्य देशों का समर्थन
भारत के स्थायी सदस्यता के दावे को कई देशों और क्षेत्रीय समूहों का समर्थन प्राप्त है। G4 समूह (भारत, जर्मनी, ब्राज़ील, और जापान) ने UNSC के सुधार और स्थायी सदस्यता के विस्तार के लिए एकजुट प्रयास किए हैं। इसके अलावा, अफ्रीकी संघ ने भी भारत की सदस्यता के समर्थन में प्रस्ताव पेश किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कई प्रमुख देशों और समूहों ने भारत के दावे को स्वीकार किया है।
**3. चुनौतियाँ और विरोध
**a. P5 सदस्य देशों का प्रतिरोध
सभी P5 सदस्य देशों ने UNSC में स्थायी सदस्यता के विस्तार के प्रति सतर्कता दिखाई है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे शक्ति संतुलन में परिवर्तन हो सकता है।
**b. क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों का विरोध
भारत के स्थायी सदस्यता के दावे का विरोध पाकिस्तान जैसे क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों द्वारा किया जाता है, जो मानते हैं कि भारत की सदस्यता से निर्णय प्रक्रियाओं में पक्षपात हो सकता है।
**4. हाल की घटनाएँ
हाल के वर्षों में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने UNSC के सुधार पर चर्चा की है, लेकिन स्थायी सदस्यता के विस्तार पर एक सामान्य सहमति अभी तक प्राप्त नहीं हुई है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता की बात की है, लेकिन ठोस निर्णय अभी तक नहीं हुआ है।
निष्कर्ष
भारत का सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का दावे को उसके वैश्विक प्रभाव, अंतरराष्ट्रीय योगदान, और कई देशों के समर्थन द्वारा मजबूती मिली है। हालांकि, P5 सदस्यों की सतर्कता और क्षेत्रीय विरोधी ताकतें इस दावे के रास्ते में बाधा बनी हुई हैं।
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