आप उसे कौन-सा रास्ता अपनाने की सलाह देंगे और क्यों देंगे ? (250 words) [UPSC 2016]
चुप रहना नैतिक दृष्टिकोण से सही क्यों नहीं है **1. नैतिक जिम्मेदारी: एक पेशेवर के रूप में, आपकी नैतिक जिम्मेदारी है कि आप ऐसे कार्यों का विरोध करें जो समाज और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। उच्च विषाक्त अपशिष्ट का नदी में प्रवाह, जो स्थानीय ग्रामीणों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, एक गंभीर नैRead more
चुप रहना नैतिक दृष्टिकोण से सही क्यों नहीं है
**1. नैतिक जिम्मेदारी: एक पेशेवर के रूप में, आपकी नैतिक जिम्मेदारी है कि आप ऐसे कार्यों का विरोध करें जो समाज और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। उच्च विषाक्त अपशिष्ट का नदी में प्रवाह, जो स्थानीय ग्रामीणों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, एक गंभीर नैतिक उल्लंघन है। ऐसा करना उन लोगों की भलाई की अनदेखी करना है जिनकी जीवन शैली और स्वास्थ्य आपके कार्यों से प्रभावित हो रहे हैं। उदाहरण के लिए, साबरमती नदी के प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर कदम उठाए हैं, जो दिखाता है कि प्रशासनिक और कानूनी मानदंड कितने महत्वपूर्ण हैं।
**2. कानूनी दायित्व: भारत में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 जैसे कानून विषाक्त अपशिष्ट प्रबंधन के लिए सख्त दिशानिर्देश प्रदान करते हैं। कंपनी के द्वारा ऐसा गैर-कानूनी कार्य करना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि कानूनी दृष्टिकोण से भी गंभीर अपराध है। इसका उदाहरण यमुना नदी का प्रदूषण है, जिसके लिए अदालतें और पर्यावरणीय संस्थाएँ लगातार कार्रवाई कर रही हैं।
**3. सामाजिक प्रभाव: आपके चुप रहने से स्थानीय लोगों की स्वास्थ्य समस्याएँ और आर्थिक समस्याएँ बढ़ सकती हैं। यह नैतिक रूप से सही नहीं है कि आप केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए सार्वजनिक भलाई की अनदेखी करें। गंगा नदी के संरक्षण में भी सार्वजनिक जागरूकता और न्यायिक हस्तक्षेप ने बहुत सकारात्मक प्रभाव डाला है।
उसे कौन-सा रास्ता अपनाने की सलाह देंगे
**1. विधिक सलाह और सुरक्षा: सबसे पहले, उसे विधिक सलाह प्राप्त करनी चाहिए और विज्ञापन सुरक्षा के विकल्पों को समझना चाहिए। कई देशों में, जैसे कि भारत में, विषयक भ्रष्टाचार और गैर-कानूनी प्रथाओं के खिलाफ संरक्षण के लिए विधिक प्रावधान होते हैं, जो उसे बिना किसी प्रतिशोध के रिपोर्ट करने में मदद कर सकते हैं।
**2. आवश्यक प्राधिकरण से संपर्क: उसे कंपनी के आवश्यक प्राधिकरण (जैसे पर्यावरण विभाग) या शासनात्मक निकायों से संपर्क करना चाहिए। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को ऐसी समस्याओं की रिपोर्ट की जा सकती है। यह उसे सरकारी तंत्र के माध्यम से समस्या को उठाने की सुविधा देगा।
**3. पर्यावरणीय संगठनों की सहायता: पर्यावरणीय संगठनों जैसे ग्रीनपीस या सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (CSE) से सहायता प्राप्त कर सकती है। ये संगठन उसे इस मुद्दे को सही ढंग से प्रस्तुत करने और कानूनी और सामाजिक समर्थन प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं।
**4. आंतरिक रिपोर्टिंग चैनल: अगर कंपनी में आंतरिक रिपोर्टिंग चैनल है, तो वह उस मार्ग से भी रिपोर्ट कर सकती है। इसके लिए, उसे अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक प्रावधानों की जानकारी प्राप्त करनी होगी।
निष्कर्ष: चुप रहना नैतिक और कानूनी दृष्टिकोण से सही नहीं है। उचित कानूनी सलाह, सरकारी प्राधिकरण से संपर्क, और पर्यावरणीय संगठनों की सहायता प्राप्त करना उसके लिए उचित कदम होंगे, ताकि वह बिना व्यक्तिगत खतरे के इस मुद्दे को सुलझा सके और समाज के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभा सके।
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चुप रहना नैतिक रूप से सही क्यों नहीं है: तर्क **1. सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी: चुप रहना उस सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को अनदेखा करना है जो प्रत्येक व्यक्ति की होती है। अत्यधिक विषाक्त अपशिष्ट का नदी में प्रवाह, स्थानीय ग्रामीणों की स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन रहा है। इस प्रकार की अनैतिRead more
चुप रहना नैतिक रूप से सही क्यों नहीं है: तर्क
**1. सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी: चुप रहना उस सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को अनदेखा करना है जो प्रत्येक व्यक्ति की होती है। अत्यधिक विषाक्त अपशिष्ट का नदी में प्रवाह, स्थानीय ग्रामीणों की स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन रहा है। इस प्रकार की अनैतिक प्रथाओं को नजरअंदाज करना और चुप रहना, उन लोगों की भलाई की अनदेखी करना है जो इस नदी पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिए, सबरिमला मंदिर मामला में, सुप्रीम कोर्ट ने धर्म और समानता के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखा, यह दर्शाते हुए कि नैतिक जिम्मेदारी से परे जाकर किसी भी अनैतिक प्रथाओं को स्वीकार करना सही नहीं है।
**2. कानूनी दायित्व: किसी भी गैर-कानूनी गतिविधि, जैसे कि विषाक्त अपशिष्ट का अवैध रूप से प्रवाह, को अनदेखा करना कानूनी दायित्व का उल्लंघन है। भारत में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत, कंपनियों को विषाक्त अपशिष्ट को ठीक से प्रबंधित करने के लिए निर्देशित किया गया है। इस कानून की अनदेखी करने वाले कार्यों को चुप रहकर स्वीकृति देना कानूनी और नैतिक दोनों दृष्टियों से गलत है। यमुना नदी का प्रदूषण और इसके कानूनी मुद्दे इसके स्पष्ट उदाहरण हैं।
**3. नैतिक ईमानदारी और व्यक्तिगत आत्म-सम्मान: चुप रहना नैतिक ईमानदारी और व्यक्तिगत आत्म-सम्मान को प्रभावित करता है। अगर वह अपनी जानबूझकर मौनता के कारण दूसरों को नुकसान पहुँचते देखे, तो उसका खुद का नैतिक दायित्व और आत्म-सम्मान प्रभावित होगा। फ्रांसिस हौगेन, जिन्होंने फेसबुक के अनैतिक व्यवहार का खुलासा किया, के उदाहरण से पता चलता है कि नैतिक ईमानदारी की रक्षा करते हुए सही काम करने से व्यक्तिगत आत्म-सम्मान और नैतिक मूल्य बनाए रहते हैं।
**4. सकारात्मक बदलाव की संभावना: अधिकारियों और कंपनियों को सकारात्मक बदलाव लाने के लिए मुद्दे को उजागर करना आवश्यक है। यदि वह इस मुद्दे की रिपोर्ट करती है, तो इसे सही किया जा सकता है, जिससे स्थानीय समुदाय की स्वास्थ्य समस्याओं को हल किया जा सकता है और प्रदूषण को कम किया जा सकता है। वोल्क्सवैगन एमिशन स्कैंडल इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जहां खुलासे के बाद महत्वपूर्ण सुधार और कंपनियों की जवाबदेही में वृद्धि हुई।
**5. विचारशीलता और जिम्मेदारी का पालन: विचारशीलता के साथ-साथ नैतिक जिम्मेदारी को बनाए रखना भी आवश्यक है। चुप रहना न केवल मौजूदा समस्याओं को अनदेखा करता है, बल्कि संभावित खतरों को भी बढ़ावा देता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की कार्रवाई के बाद कई पर्यावरणीय मुद्दे हल किए गए हैं, जो दर्शाता है कि खुलेपन और रिपोर्टिंग से समाज को लाभ हो सकता है।
निष्कर्ष: चुप रहना नैतिक दृष्टिकोण से सही नहीं है क्योंकि यह सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी की अनदेखी करता है, कानूनी दायित्वों का उल्लंघन करता है, व्यक्तिगत आत्म-सम्मान को प्रभावित करता है, और सकारात्मक बदलाव की संभावना को रोकता है। नैतिकता और जिम्मेदारी का पालन करते हुए सही कदम उठाना आवश्यक है।
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