मानव विकास का मापन कैसे किया जाता है? मानव विकास कार्य-सूची को प्राप्त करने के लिए बिहार सरकार की सात प्रतिबद्धताएँ क्या हैं? इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सरकार की योजनाओं को समझाइए। [67वीं बीपीएससी मुख्य परीक्षा 2022]
19वीं सदी के उत्तरार्द्ध से भारतीय राष्ट्रवाद के विकास की आलोचनात्मक समीक्षा 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारतीय राष्ट्रवाद ने एक नए मोड़ को लिया, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की दिशा तय की। ब्रिटिश उपनिवेशी शासन के विरोध में उभरा यह राष्ट्रवाद समय के साथ सामाजिक और सांसRead more
19वीं सदी के उत्तरार्द्ध से भारतीय राष्ट्रवाद के विकास की आलोचनात्मक समीक्षा
19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारतीय राष्ट्रवाद ने एक नए मोड़ को लिया, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की दिशा तय की। ब्रिटिश उपनिवेशी शासन के विरोध में उभरा यह राष्ट्रवाद समय के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलनों से जुड़ा और अंततः स्वतंत्रता संग्राम का आधार बना। इस विकास को समझने के लिए हमें विभिन्न पहलुओं पर गौर करना होगा।
1. 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में राष्ट्रवाद का उदय
सामाजिक और सांस्कृतिक सुधार आंदोलन
- रवींद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore), दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद जैसे नेताओं ने भारतीय समाज में सुधार लाने के लिए काम किया। इन आंदोलनों का उद्देश्य भारतीय समाज को सुधारना और पश्चिमी सोच से प्रभावित होना था। उन्होंने भारतीय परंपराओं और संस्कृति को सम्मानित करते हुए समाज को जागरूक किया।
संस्कृतिक पुनर्जागरण
- भारतीय समाज में पुनर्जागरण का आरंभ हुआ, जिसमें बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे साहित्यकारों ने भारतीय सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान को जागरूक किया। उनके लेखन में भारतीय स्वतंत्रता की भावना और सांस्कृतिक गर्व को प्रमुख स्थान मिला।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन (1885)
- 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) का गठन हुआ। यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोर्चा था, जिसमें प्रमुख भारतीय नेताओं ने एक मंच पर एकत्र होकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाई। प्रारंभ में, इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन से समायोजन करना था, लेकिन धीरे-धीरे यह स्वतंत्रता संग्राम की दिशा में बदल गया।
2. 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में राष्ट्रवाद के विभिन्न रूप
मध्यमवर्गीय राष्ट्रवाद
- 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में राष्ट्रवाद मुख्य रूप से मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों द्वारा प्रकट किया गया था। इस वर्ग ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जागरूकता फैलाने के लिए साहित्य, प्रेस और शिक्षा का उपयोग किया। उदाहरण के तौर पर आंग्ल भारतीय लेखक और पत्रकार जैसे लाला लाजपत राय, दयानंद सरस्वती, और बाल गंगाधर तिलक ने अपनी लेखनी और विचारों से भारतीय समाज में जागरूकता फैलायी।
राजनीतिक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
- बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय, और बाल गंगाधर तिलक जैसे नेता भारतीय राजनीति में सक्रिय हुए और भारतीय राष्ट्रवाद को एक मजबूत राजनीतिक आधार प्रदान किया। तिलक ने “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” का नारा दिया, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की धारा को प्रेरित करने वाला था।
हिंदू धर्म और राष्ट्रीयता का मेल
- इस समय में हिंदू धर्म और राष्ट्रवाद का एक खास मेल देखने को मिला। तिलक और दयानंद सरस्वती ने भारतीय संस्कृति और धर्म को राष्ट्रीयता से जोड़कर आंदोलन को और प्रभावी किया।
3. आलोचनात्मक दृष्टिकोण
मध्यमवर्गीय राष्ट्रवाद का सीमित प्रभाव
- 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध का राष्ट्रवाद मध्यमवर्गीय बौद्धिक वर्ग द्वारा संचालित था, जिसका प्रभाव व्यापक रूप से गरीब और ग्रामीण वर्गों तक नहीं पहुंचा। अधिकतर शहरी वर्ग तक सीमित होने के कारण इस आंदोलन को पूरे देश में समान रूप से समर्थन नहीं मिल सका।
ब्रिटिश शोषण के प्रति धीमी प्रतिक्रिया
- प्रारंभ में भारतीय नेताओं का दृष्टिकोण ब्रिटिश शासन से सहयोगपूर्ण था। यह शुद्ध रूप से एक सुधारवादी दृष्टिकोण था, न कि स्वतंत्रता संग्राम की ओर पूर्ण रूप से मोड़। इसका कारण यह था कि ब्रिटिश शासन के तहत कई सुधार और विकास के कार्य किए गए थे, जैसे रेल नेटवर्क और शिक्षा का प्रसार, जिनका लाभ शहरी और संभ्रांत वर्ग ने लिया। इसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश शासकों के खिलाफ संघर्ष शुरू होने में कुछ समय लगा।
सामाजिक असमानताएँ
- भारतीय राष्ट्रवाद में सामाजिक असमानताएँ बनी रहीं। इस समय तक भारतीय समाज में जातिवाद और धर्मांधता जैसी सामाजिक समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया था। इसके कारण राष्ट्रवाद के विचार को सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंचाया जा सका।
4. 20वीं सदी में राष्ट्रवाद का उभार
- 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में राष्ट्रवाद की जो नींव रखी गई, वह 20वीं सदी में महात्मा गांधी, नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और अन्य नेताओं द्वारा स्वतंत्रता संग्राम में रूपांतरित हुई। गांधीजी का सत्याग्रह और अहिंसा का मार्ग भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य आधार बने।
निष्कर्ष
19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारतीय राष्ट्रवाद ने सामाजिक और सांस्कृतिक सुधारों के माध्यम से जन्म लिया और धीरे-धीरे एक मजबूत राजनीतिक आंदोलन का रूप लिया। हालांकि इसमें कुछ सीमाएँ थीं, जैसे कि इसे शुरू में शहरी और मध्यमवर्गीय वर्ग द्वारा नियंत्रित किया गया और इसकी पहुंच ग्रामीण क्षेत्रों तक कम थी। इसके बावजूद, यह राष्ट्रवाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक मजबूत आधार बना और अंततः भारत को स्वतंत्रता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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मानव विकास का मापन कैसे किया जाता है? मानव विकास का मापन मानव विकास सूचकांक (HDI) के माध्यम से किया जाता है, जो संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा विकसित किया गया एक सूचकांक है। यह सूचकांक तीन प्रमुख आयामों पर आधारित होता है: जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) व्यक्ति की औसत आयु जीवन प्रत्यRead more
मानव विकास का मापन कैसे किया जाता है?
मानव विकास का मापन मानव विकास सूचकांक (HDI) के माध्यम से किया जाता है, जो संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा विकसित किया गया एक सूचकांक है। यह सूचकांक तीन प्रमुख आयामों पर आधारित होता है:
इन आयामों के आधार पर HDI के माध्यम से किसी देश या राज्य की मानव विकास स्तर को आँका जाता है। यह 0 से 1 के बीच होता है, जिसमें 1 उच्चतम मानव विकास को दर्शाता है।
बिहार सरकार की सात प्रतिबद्धताएँ
बिहार सरकार ने मानव विकास कार्य-सूची को प्राप्त करने के लिए सात प्रतिबद्धताएँ निर्धारित की हैं, जिन्हें “सात निश्चय” भी कहा जाता है। ये नीतियाँ बिहार के सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाई गई हैं:
इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बिहार सरकार की योजनाएँ
बिहार सरकार ने इन सात निश्चयों को साकार करने के लिए कई योजनाओं को लागू किया है:
- नल-जल योजना: इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराया जा रहा है।
- पक्की सड़क और नाली योजना: ग्रामीण सड़कों और नालियों के निर्माण के लिए योजना बनाई गई है, ताकि बुनियादी ढांचे में सुधार हो।
- शौचालय निर्माण योजना: स्वच्छ भारत मिशन के तहत सभी घरों में शौचालय बनाए जा रहे हैं ताकि स्वच्छता में सुधार हो सके।
- बिजली योजना: सात निश्चय के तहत हर घर को बिजली देने के उद्देश्य से राज्य में ग्रामीण विद्युतीकरण पर बल दिया गया है।
- कौशल विकास योजना: युवाओं को रोजगार-उन्मुख प्रशिक्षण देने के लिए कौशल विकास मिशन के अंतर्गत कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
- स्वयं सहायता भत्ता योजना: यह योजना बेरोजगार युवाओं को आर्थिक सहायता प्रदान करती है, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें।
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