- कानूनी सुरक्षा के बावजूद: भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में दिव्यांग जनों का अपवर्जन।
- संख्या: भारत में लगभग 70 मिलियन दिव्यांग जन हैं।
प्रमुख प्रावधान
- दिव्यांगता की परिभाषा:
- 1995 का अधिनियम दिव्यांगता को सामान्य कार्य में बाधा के रूप में परिभाषित करता है।
- RPWD अधिनियम, 2016 के तहत दिव्यांगता की 21 श्रेणियाँ।
- आरक्षण:
- सरकारी नौकरियों में 4% और उच्च शिक्षा में 5% आरक्षण।
प्रमुख कानून
- भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992: पुनर्वास सेवाओं का नियमन।
- मानसिक स्वास्थ्य सेवा अधिनियम, 2017: अधिकार आधारित मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ।
प्रमुख मुद्दे
- डिजिटल अपवर्जन:
- सहायक प्रौद्योगिकी की कमी।
- केवल 36.61% दिव्यांग जन नियमित डिजिटल सेवाओं का उपयोग करते हैं।
- रोज़गार में बाधाएँ:
- 34 लाख में से केवल 1.3 करोड़ दिव्यांग जन रोजगार योग्य हैं।
- कार्यस्थल पर भेदभाव और दुर्गम वातावरण।
- स्वास्थ्य देखभाल में सीमाएँ:
- दुर्गम अस्पताल और विशेषज्ञों की कमी।
- मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ अविकसित।
- शहरी नियोजन में कमी:
- सुगम्य भारत अभियान के बावजूद, 3% इमारतें ही पूरी तरह से सुलभ।
- जलवायु परिवर्तन का प्रभाव:
- आपदाओं में दिव्यांग जनों की मृत्यु दर सामान्य जनसंख्या से 2-4 गुना अधिक।
समाधान
- डिजिटल और तकनीकी सुगम्यता:
- ICT मानक IS 17802 का पालन।
- सहायक प्रौद्योगिकियों का एकीकरण।
- समावेशी रोजगार नीतियाँ:
- राष्ट्रीय दिव्यांगता-समावेशी रोजगार नीति का निर्माण।
- स्वास्थ्य और पुनर्वास सेवाएँ:
- आयुष्मान भारत में दिव्यांग जनों के लिए सेवाओं का एकीकरण।
- सुगम्य शहरी नियोजन:
- सार्वजनिक अवसंरचना में बाधा-मुक्तता सुनिश्चित करना।
- सामाजिक जागरूकता:
- दिव्यांगता के प्रति रूढ़िवादी धारणाओं को चुनौती देने के लिए अभियान।
आगे की राह
- भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का विकास समावेशी होना चाहिए, जिससे दिव्यांग जनों को भी समान अवसर मिल सकें।