Lost your password? Please enter your email address. You will receive a link and will create a new password via email.
Please briefly explain why you feel this question should be reported.
Please briefly explain why you feel this answer should be reported.
Please briefly explain why you feel this user should be reported.
Explain the evolution of the Home Rule movement in India and its contributions. (200 words)
The Home Rule movement in India emerged in the early 20th century as a response to British colonial rule and aimed to achieve self-governance. It gained momentum with the formation of the Home Rule League in 1916 by Bal Gangadhar Tilak and Annie Besant, advocating for greater autonomy within the BriRead more
The Home Rule movement in India emerged in the early 20th century as a response to British colonial rule and aimed to achieve self-governance. It gained momentum with the formation of the Home Rule League in 1916 by Bal Gangadhar Tilak and Annie Besant, advocating for greater autonomy within the British Empire.
The movement marked a shift in Indian nationalism, moving from moderate demands for reform to a more assertive call for self-rule. Tilak emphasized the need for political rights and social reforms, while Besant focused on education and social upliftment. Their efforts galvanized public opinion and mobilized grassroots support, particularly among the Indian middle class.
The Home Rule movement significantly contributed to the Indian independence struggle by:
Ultimately, the Home Rule movement laid the groundwork for subsequent demands for independence, culminating in the larger struggle against colonial rule.
See lessजेंडर बजटिंग क्या है? भारतीय संदर्भ में इससे जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा करें।(200 words)
जेंडर बजटिंग एक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य बजट को महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता को बढ़ावा देने के लिए तैयार करना है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी खर्च और नीतियों में जेंडर आधारित अंतर को समझा जाए और संबोधित किया जाए। भारत में, जेंडर बजटिंग का प्रारंभ 2005 में हुआ, जब सरकारRead more
जेंडर बजटिंग एक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य बजट को महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता को बढ़ावा देने के लिए तैयार करना है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी खर्च और नीतियों में जेंडर आधारित अंतर को समझा जाए और संबोधित किया जाए। भारत में, जेंडर बजटिंग का प्रारंभ 2005 में हुआ, जब सरकार ने इसे अपनी योजनाओं में शामिल करना शुरू किया।
भारतीय संदर्भ में जेंडर बजटिंग के कई चुनौतियाँ हैं। सबसे पहली चुनौती है डेटा की कमी; अक्सर जेंडर-विशिष्ट डेटा उपलब्ध नहीं होता है, जिससे नीतियों का सही मूल्यांकन करना मुश्किल होता है। दूसरी चुनौती सामाजिक और सांस्कृतिक बाधाएँ हैं, जो महिलाओं की भागीदारी को सीमित करती हैं। इसके अलावा, बजट में जेंडर पर ध्यान देने के लिए आवश्यक राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव भी एक बड़ी समस्या है।
अंत में, जेंडर बजटिंग की प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि न केवल आंकड़ों को संकलित किया जाए, बल्कि समाज में जागरूकता बढ़ाई जाए और नीति निर्माण में महिलाओं की आवाज को शामिल किया जाए।
See lessAfter the death of Katyuri King Brahmdev, this state was divided among whom? Describe. [Answer Limit: 250 words] [UKPSC 2023]
After the death of Katyuri King Brahmdev in the 12th century, the Katyuri state, which had been a prominent power in the Kumaon region, became fragmented. The lack of a strong successor led to internal conflicts among Brahmdev's heirs, resulting in the division of the kingdom into several smaller prRead more
After the death of Katyuri King Brahmdev in the 12th century, the Katyuri state, which had been a prominent power in the Kumaon region, became fragmented. The lack of a strong successor led to internal conflicts among Brahmdev’s heirs, resulting in the division of the kingdom into several smaller principalities.
Primarily, the kingdom split into two main factions: one led by King Bhairavchandra, who controlled the Kashipur region, and the other by King Sumitra, who ruled over the Dwar region. This division created a power struggle between the two branches, with each vying for control and legitimacy over the entire Katyuri territory.
As a result of this fragmentation, the authority of the Katyuri dynasty weakened significantly, leading to the rise of other regional powers, such as the Chand dynasty in the Garhwal region. The infighting and lack of cohesion allowed external forces to exploit the situation, further destabilizing the region.
This division not only marked the decline of the Katyuri dynasty but also set the stage for the emergence of new political entities in Kumaon and surrounding areas. The rivalry and territorial disputes that followed ultimately led to the disintegration of the Katyuri influence in northern India, changing the political landscape of the region for years to come.
See lessकत्यूरी शासक राजा ब्रह्मदेव की मृत्यु के बाद यह राज्य किनके मध्य विभक्त हो गया था ? विवरण दीजिए । [उत्तर सीमा: 250 शब्द] [UKPSC 2023]
कत्यूरी शासक राजा ब्रह्मदेव की मृत्यु के बाद, उनका राज्य 12वीं शताब्दी में कई हिस्सों में विभक्त हो गया। ब्रह्मदेव के बाद, उनके उत्तराधिकारियों में राज्य की सत्ता को लेकर संघर्ष बढ़ गया, जिससे राजनैतिक अस्थिरता उत्पन्न हुई। उनके उत्तराधिकारियों में से विभिन्न शासकों ने क्षेत्रीय शक्तियों के रूप मेंRead more
कत्यूरी शासक राजा ब्रह्मदेव की मृत्यु के बाद, उनका राज्य 12वीं शताब्दी में कई हिस्सों में विभक्त हो गया। ब्रह्मदेव के बाद, उनके उत्तराधिकारियों में राज्य की सत्ता को लेकर संघर्ष बढ़ गया, जिससे राजनैतिक अस्थिरता उत्पन्न हुई। उनके उत्तराधिकारियों में से विभिन्न शासकों ने क्षेत्रीय शक्तियों के रूप में उभरना शुरू किया।
राज्य मुख्यतः दो भागों में विभाजित हुआ: काशीपुर और द्यूर। काशीपुर क्षेत्र पर राजा भैरवचंद्र ने शासन किया, जबकि द्यूर क्षेत्र का नियंत्रण राजा सुमित्र द्वारा किया गया। इन दोनों शाखाओं के बीच सत्ता की लड़ाई ने राज्य को और भी कमजोर कर दिया, और परिणामस्वरूप, कत्यूरी साम्राज्य का प्रभाव क्षेत्र में कमज़ोर होने लगा।
इस विभाजन के परिणामस्वरूप, अन्य साम्राज्य जैसे गढ़वाल और चंदेल भी क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने लगे। इससे स्थानीय राजनैतिक परिदृश्य में परिवर्तन आया और क्षेत्र में अलग-अलग राजनैतिक शक्तियों का उदय हुआ। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे कत्यूरी साम्राज्य के पतन की दिशा में बढ़ी, जो अंततः उनकी शक्ति और प्रभाव को समाप्त कर गई।
इस प्रकार, राजा ब्रह्मदेव की मृत्यु के बाद का यह विभाजन न केवल कत्यूरी साम्राज्य के लिए, बल्कि उत्तराखंड के समग्र राजनीतिक इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
See lessDiscuss the contribution of Kalu Mahra in the Revolt of 1857. [Answer Limit: 250 words] [UKPSC 2023]
Kalu Mahra played a significant role in the Revolt of 1857, particularly in the Kumaon region of Uttarakhand. He emerged as a prominent leader who mobilized local communities against British rule. As a folk hero and a symbol of resistance, Mahra inspired villagers and peasants to rise up against colRead more
Kalu Mahra played a significant role in the Revolt of 1857, particularly in the Kumaon region of Uttarakhand. He emerged as a prominent leader who mobilized local communities against British rule. As a folk hero and a symbol of resistance, Mahra inspired villagers and peasants to rise up against colonial oppression.
His contributions were marked by his ability to unite various segments of society, including farmers and local artisans, to participate in the revolt. Kalu Mahra raised awareness about the injustices faced by the common people under British policies, particularly regarding land revenue and taxation, which had burdened the rural population.
Mahra led several uprisings and was instrumental in organizing resistance against British forces. His leadership provided a sense of identity and purpose to the local populace, encouraging them to fight for their rights and dignity. He was also known for his emphasis on indigenous cultural values, which resonated with the people and reinforced their resolve to challenge colonial authority.
Despite the ultimate suppression of the revolt, Kalu Mahra’s efforts were crucial in igniting the spirit of rebellion in the Kumaon region. His legacy continues to be celebrated as a testament to the bravery and resilience of those who fought against colonial rule, and he remains an important figure in the narrative of India’s struggle for independence.
See less1857 के विद्रोह में कालू माहरा के योगदान का वर्णन कीजिए । [उत्तर सीमा: 250 शब्द] [UKPSC 2023]
1857 के विद्रोह में कालू माहरा का योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। कालू माहरा, जो कि उत्तर प्रदेश के काशीपुर क्षेत्र के निवासी थे, ने विद्रोह में एक प्रमुख नेता के रूप में कार्य किया। उनका लक्ष्य न केवल ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ लड़ना था, बल्कि उन्होंने स्थानीय जनजातियों और किसानों को भी एकजुट करRead more
1857 के विद्रोह में कालू माहरा का योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। कालू माहरा, जो कि उत्तर प्रदेश के काशीपुर क्षेत्र के निवासी थे, ने विद्रोह में एक प्रमुख नेता के रूप में कार्य किया। उनका लक्ष्य न केवल ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ लड़ना था, बल्कि उन्होंने स्थानीय जनजातियों और किसानों को भी एकजुट करने का प्रयास किया।
कालू माहरा ने अपने प्रभाव क्षेत्र में जागरूकता फैलाने के लिए प्रचार किया और लोगों को विद्रोह में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति और गौरव को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया, जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौरान कमजोर हो रहा था। उनके नेतृत्व में कई किसान और श्रमिक ब्रिटिश सेनाओं के खिलाफ खड़े हुए।
कालू माहरा ने न केवल स्थानीय संघर्ष को प्रेरित किया, बल्कि उन्होंने विद्रोह के उद्देश्य को स्पष्ट करने के लिए रणनीति भी विकसित की। उनका योगदान इस दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था कि उन्होंने आदिवासी और ग्रामीण समुदायों को संगठित किया, जो विद्रोह की शक्ति को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ।
हालांकि, विद्रोह को अंततः दबा दिया गया, कालू माहरा और उनके साथियों की बहादुरी और संघर्ष ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी प्रेरणा और नेतृत्व आज भी भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
See lessWhat was the role of Garhwal and Kumaun in the Quit India Movement ? Discuss. [Answer Limit: 250 words] [UKPSC 2023]
Garhwal and Kumaun, two regions in Uttarakhand, played significant roles in the Quit India Movement of 1942, reflecting the broader national struggle against British colonial rule. In Garhwal, the movement was marked by widespread protests and demonstrations. Local leaders mobilized villagers, urginRead more
Garhwal and Kumaun, two regions in Uttarakhand, played significant roles in the Quit India Movement of 1942, reflecting the broader national struggle against British colonial rule.
In Garhwal, the movement was marked by widespread protests and demonstrations. Local leaders mobilized villagers, urging them to participate in strikes and resist British authority. The region saw a surge in nationalist sentiments, with people organizing rallies and refusing to pay taxes. Notably, the Garhwal Regiment mutinied, reflecting discontent among soldiers, which inspired civilians to intensify their struggle.
Kumaun also witnessed significant activism, with students and local leaders leading efforts to galvanize support for the movement. The Kumaon Sabha, an important political body, played a crucial role in spreading awareness and organizing protests. Many youths participated in civil disobedience, refusing to cooperate with colonial authorities. The region experienced crackdowns, with numerous arrests of activists, further fueling resistance.
The involvement of local peasants, laborers, and students in both regions underscored a collective desire for freedom, showcasing the deep-rooted anti-colonial sentiments that permeated even remote areas. The sacrifices made by these communities contributed to the larger narrative of the Quit India Movement, highlighting the unity and resolve of the Indian populace against colonial rule. Ultimately, the efforts in Garhwal and Kumaun symbolized the spirit of resistance that characterized the national struggle for independence.
See lessराष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की संरचना और कार्यों का विवरण कीजिए। साथ ही, महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के लिए आयोग द्वारा शुरू की गई पहलों को भी बताइए। (200 words)
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) भारत सरकार का एक स्वतंत्र निकाय है, जिसकी स्थापना 31 जनवरी 1992 को हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा, उनकी भलाई और सशक्तीकरण को बढ़ावा देना है। आयोग की संरचना में एक अध्यक्ष और पांच सदस्य होते हैं, जिनमें से कम से कम दो सदस्य ऐसे होते हैं, जो महिलाओंRead more
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) भारत सरकार का एक स्वतंत्र निकाय है, जिसकी स्थापना 31 जनवरी 1992 को हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा, उनकी भलाई और सशक्तीकरण को बढ़ावा देना है। आयोग की संरचना में एक अध्यक्ष और पांच सदस्य होते हैं, जिनमें से कम से कम दो सदस्य ऐसे होते हैं, जो महिलाओं के मुद्दों पर कार्य कर चुके हैं।
NCW के कार्यों में महिलाओं के प्रति होने वाले अत्याचारों की जांच करना, सरकार को सलाह देना, और कानूनों में सुधार के लिए सिफारिशें करना शामिल हैं। आयोग विभिन्न महिला केंद्रित कार्यक्रमों का संचालन भी करता है, जैसे कि साक्षरता, स्वास्थ्य, और रोजगार के अवसर।
महिला सशक्तीकरण के लिए NCW ने कई पहल शुरू की हैं, जैसे “महिला हेल्पलाइन” जो महिलाओं को तत्काल सहायता प्रदान करती है। इसके अलावा, “सशक्त नारी” और “महिला सशक्तीकरण का अभियान” जैसी परियोजनाएं चलाकर जागरूकता बढ़ाने का काम कर रहा है। आयोग का उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और समाज में उनके स्थान को मजबूत करना है।
See lessगढ़वाल एवं कुमाऊँ की भारत छोड़ो आन्दोलन में क्या भूमिका थी? व्याख्या कीजिए। [उत्तर सीमा: 250 शब्द] [UKPSC 2023]
गढ़वाल और कुमाऊँ ने भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक अहम पड़ाव था। इस आंदोलन ने उत्तराखंड के इन क्षेत्रों में व्यापक जनसंघर्ष को जन्म दिया। गढ़वाल की भूमिका: गढ़वाल में स्थानीय नेताओं ने आंदोलन को गति दी। यहाँ के किसानों, श्रमिकों और विद्यार्थिRead more
गढ़वाल और कुमाऊँ ने भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक अहम पड़ाव था। इस आंदोलन ने उत्तराखंड के इन क्षेत्रों में व्यापक जनसंघर्ष को जन्म दिया।
गढ़वाल की भूमिका:
गढ़वाल में स्थानीय नेताओं ने आंदोलन को गति दी। यहाँ के किसानों, श्रमिकों और विद्यार्थियों ने मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए। गढ़वाल में, आंदोलन ने ग्रामीण इलाकों में जागरूकता फैलाई, और लोगों ने स्वतंत्रता के लिए सशक्त तरीके से आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
कुमाऊँ की भूमिका:
कुमाऊँ में भी आंदोलन का व्यापक असर देखा गया। यहाँ के लोगों ने रैलियाँ निकालीं और सत्याग्रह किए। स्थानीय नेताओं जैसे कि हरि चंद्र कर्णाटक ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। महिलाओं ने भी इस आंदोलन में सक्रिय भाग लिया, जिससे आंदोलन की धार और मजबूत हुई।
सामूहिक संघर्ष:
दोनों क्षेत्रों में आंदोलनों ने ग्रामीण समुदायों को एकजुट किया और सामूहिक चेतना को जागृत किया। यहाँ के लोग न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग कर रहे थे, बल्कि सामाजिक और आर्थिक सुधारों की भी आवश्यकता महसूस कर रहे थे।
इस प्रकार, गढ़वाल और कुमाऊँ ने भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की, जो स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया। इन क्षेत्रों की सक्रियता ने न केवल स्थानीय समुदायों को प्रभावित किया, बल्कि पूरे देश के स्वतंत्रता आंदोलन को भी नई ऊर्जा दी।
See lessWrite a note on Subhash Chandra Bose and Indian National Army. [Answer Limit: 250 words] [UKPSC 2023]
Subhash Chandra Bose was a prominent leader in the Indian independence movement, known for his radical approach to securing freedom from British rule. Born on January 23, 1897, in Cuttack, Odisha, Bose was a member of the Indian National Congress but soon became disillusioned with the moderate tactiRead more
Subhash Chandra Bose was a prominent leader in the Indian independence movement, known for his radical approach to securing freedom from British rule. Born on January 23, 1897, in Cuttack, Odisha, Bose was a member of the Indian National Congress but soon became disillusioned with the moderate tactics of other leaders. He believed that armed struggle was essential for achieving independence.
In 1943, Bose formed the Indian National Army (INA) with the support of Japan during World War II. The INA aimed to liberate India from British rule through military action. Bose’s rallying cry, “Give me blood, and I shall give you freedom,” inspired many Indians to join the cause. The army comprised Indian prisoners of war and expatriates in Southeast Asia.
Under Bose’s leadership, the INA engaged in several military campaigns, particularly in the Burma front. Although the army faced setbacks and was ultimately defeated, it became a symbol of resistance against colonial rule and inspired a sense of nationalism among Indians.
Bose’s vision extended beyond military efforts; he sought to unify all factions of the Indian independence movement. His emphasis on self-reliance, dignity, and equality resonated with many. Although Bose’s efforts did not lead to immediate independence, his legacy significantly influenced the course of India’s freedom struggle, making him a revered figure in Indian history. His ideals and determination continue to inspire future generations in their quest for justice and equality.
See less