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Explain the postulates of Bohr's model for hydrogen atom.
Introduction: Niels Bohr's model of the hydrogen atom, proposed in 1913, was a groundbreaking advancement in atomic theory. It introduced concepts that explained the stability of atoms and the discrete line spectra observed in hydrogen. Postulates of Bohr’s Model: Quantized Orbits: Description: ElecRead more
Introduction: Niels Bohr’s model of the hydrogen atom, proposed in 1913, was a groundbreaking advancement in atomic theory. It introduced concepts that explained the stability of atoms and the discrete line spectra observed in hydrogen.
Postulates of Bohr’s Model:
L=nℏ, where
n is a positive integer (quantum number) and
ℏ is the reduced Planck constant.
n, which determines the size and energy of the orbit.
Conclusion: Bohr’s model, with its postulates of quantized orbits, energy levels, angular momentum, and the Rydberg formula, was a significant leap in atomic theory. It provided explanations for the stability of atoms and the discrete spectra observed in hydrogen. The principles of Bohr’s model continue to influence modern scientific technologies, from quantum dots and MRI to advanced telescopes and laser spectroscopy.
See less'स्मार्ट शहरों' से क्या तात्पर्य है? भारत के शहरी विकास में इनकी प्रासंगिकता का परीक्षण कीजिए। क्या इससे ग्रामीण तथा शहरी भेदभाव में बढ़ोतरी होगी? पी० यू० आर० ए० एवं आर० यू० आर० बी० ए० एन० मिशन के सन्दर्भ में 'स्मार्ट गाँवों' के लिए तर्क प्रस्तुत कीजिए। (200 words) [UPSC 2016]
स्मार्ट शहर वे शहरी क्षेत्र हैं जो डिजिटल तकनीक और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) का उपयोग करके अपने प्रदर्शन, जीवन की गुणवत्ता और संसाधनों के प्रबंधन में सुधार करते हैं। इसमें स्मार्ट बुनियादी ढाँचा, स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन, ऊर्जा दक्षता और सार्वजनिक सेवाओं की बेहतरी शामिल होती है। उदाहरण केRead more
स्मार्ट शहर वे शहरी क्षेत्र हैं जो डिजिटल तकनीक और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) का उपयोग करके अपने प्रदर्शन, जीवन की गुणवत्ता और संसाधनों के प्रबंधन में सुधार करते हैं। इसमें स्मार्ट बुनियादी ढाँचा, स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन, ऊर्जा दक्षता और सार्वजनिक सेवाओं की बेहतरी शामिल होती है। उदाहरण के लिए, स्मार्ट दिल्ली में ट्रैफिक प्रबंधन के लिए स्मार्ट सिग्नल और ऊर्जा प्रबंधन के लिए सोलर पैनल लगाए गए हैं।
भारत के शहरी विकास में प्रासंगिकता
स्मार्ट शहर सार्वजनिक सेवाओं की दक्षता बढ़ाते हैं, जैसे स्वच्छ जल, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, और सहज परिवहन। स्मार्ट बेंगलुरु ने ट्रैफिक जाम कम करने के लिए स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल लागू किए हैं।
ये हरित प्रौद्योगिकियाँ और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाते हैं, जिससे पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है। अहमदाबाद में सोलर पैनल और इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए गए हैं।
स्मार्ट शहर निवेश और रोजगार के अवसर उत्पन्न करते हैं, जैसे पुणे में आईटी और टेक्नोलॉजी सेक्टर में वृद्धि।
ग्रामीण-शहरी भेदभाव में वृद्धि
स्मार्ट शहरों पर ध्यान केंद्रित करने से ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों और विकास की कमी हो सकती है, जिससे ग्रामीण-शहरी भेदभाव बढ़ सकता है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी कर सकता है।
‘स्मार्ट गाँवों’ के लिए तर्क
पी.यू.आर.ए. का लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराना है, जिससे जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो। स्मार्ट गाँव इन सुविधाओं को बढ़ावा दे सकते हैं और ग्रामीण पलायन को रोक सकते हैं।
आर.यू.आर.बी.एएन मिशन का उद्देश्य सभी सुविधाएँ और आर्थिक विकास को ग्रामीण क्षेत्रों में लाना है। स्मार्ट गाँव इस दृष्टिकोण को आगे बढ़ा सकते हैं और सतत विकास को बढ़ावा दे सकते हैं।
निष्कर्ष
स्मार्ट शहरों का विकास भारत के शहरी क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन स्मार्ट गाँवों को भी उतना ही महत्व देना चाहिए ताकि ग्रामीण-शहरी भेदभाव कम हो सके और सतत विकास संभव हो सके। पी.यू.आर.ए. और आर.यू.आर.बी.एएन मिशन जैसे कार्यक्रम इस प्रक्रिया में सहायक हो सकते हैं।
See lessWhat are 'Smart Cities? Examine their relevance for urban development in India. Will it increase rural-urban differences? Give arguments for 'Smart Villages' in the light of PURA and RURBAN Mission. (200 words) [UPSC 2016]
Smart Cities are urban areas that use digital technology to enhance performance, well-being, and reduce costs & resource consumption across the city. They integrate information and communication technology (ICT) with Internet of Things (IoT) to manage assets and resources efficiently. Features iRead more
Smart Cities are urban areas that use digital technology to enhance performance, well-being, and reduce costs & resource consumption across the city. They integrate information and communication technology (ICT) with Internet of Things (IoT) to manage assets and resources efficiently. Features include smart infrastructure, intelligent traffic management, sustainable energy solutions, and improved public services.
Relevance for Urban Development in India
Smart cities aim to improve urban living standards by offering better public services, such as clean water, efficient waste management, and reliable transportation. For instance, Ahmedabad and Pune have implemented smart traffic management systems to ease congestion and improve air quality.
They focus on sustainable development by incorporating green technologies and renewable energy sources, reducing the environmental footprint of urbanization. The Delhi Smart City Project emphasizes solar energy and electric vehicle infrastructure.
Smart cities attract investments and create job opportunities in technology and infrastructure sectors, contributing to overall economic growth.
Impact on Rural-Urban Differences
While smart cities aim to address urban challenges, they risk increasing rural-urban disparities by concentrating resources and development in urban areas. This can lead to the neglect of rural areas and exacerbate inequalities.
Arguments for ‘Smart Villages’
PURA aims to bridge the gap between urban and rural areas by providing urban-like amenities in rural settings. Implementing smart technologies in villages can improve quality of life, infrastructure, and economic activities, thereby reducing migration to cities.
The RURBAN Mission focuses on transforming rural areas by integrating urban amenities, economic development, and infrastructure improvements. Smart villages would benefit from this approach by fostering sustainable development and empowerment in rural areas.
Conclusion
While smart cities are crucial for urban development in India, there is a need to balance this with initiatives for smart villages to prevent widening rural-urban gaps. Programs like PURA and the RURBAN Mission can help in creating sustainable and inclusive development across both urban and rural areas.
See less"सुधारोत्तर अवधि में सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) की समग्र संवृद्धि में औद्योगिक संवृद्धि दर पिछड़ती गई है।" कारण बताइए । औद्योगिक नीति में हाल में किए गए परिवर्तन औद्योगिक संवृद्धि दर को बढ़ाने में कहां तक सक्षम हैं ? (250 words) [UPSC 2017]
परिचय सुधारोत्तर अवधि में, भारत में सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) की समग्र संवृद्धि में औद्योगिक संवृद्धि दर पिछड़ती गई है। इस अंतर के पीछे विभिन्न कारण हैं और हाल में किए गए औद्योगिक नीतिगत परिवर्तन इस स्थिति को सुधारने में कितने सक्षम हैं, यह जानना आवश्यक है। औद्योगिक संवृद्धि में पिछड़ने के कारण नRead more
परिचय
सुधारोत्तर अवधि में, भारत में सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) की समग्र संवृद्धि में औद्योगिक संवृद्धि दर पिछड़ती गई है। इस अंतर के पीछे विभिन्न कारण हैं और हाल में किए गए औद्योगिक नीतिगत परिवर्तन इस स्थिति को सुधारने में कितने सक्षम हैं, यह जानना आवश्यक है।
औद्योगिक संवृद्धि में पिछड़ने के कारण
आर्थिक सुधारों के बावजूद, नियमित बाधाएँ और आबकारी कानूनों ने औद्योगिक वृद्धि को प्रभावित किया है। जटिल श्रम कानून और कर नीतियों के कारण व्यावसायिक माहौल को नुकसान हुआ है।
सड़क, ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स जैसी आधारभूत संरचनाओं की कमी ने औद्योगिक दक्षता और प्रतिस्पर्धा को प्रभावित किया है। लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक में भारत की स्थिति कमज़ोर है।
निवेश की कमी और सूक्ष्म और लघु उद्योगों के लिए वित्तीय सुलभता की कमी ने औद्योगिक विस्तार को सीमित किया है। उच्च ब्याज दरें और सख्त ऋण प्रथाएँ इन समस्याओं को बढ़ाती हैं।
भारतीय उद्योगों की तकनीकी उन्नति में धीमापन ने उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित किया है। अनुसंधान और विकास (आर.डी.) पर खर्च अन्य देशों की तुलना में कम है।
हाल के परिवर्तन और उनकी प्रभावशीलता
पी.एल.आई. योजना के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा, और वस्त्र जैसे क्षेत्रों में प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं। इस योजना ने इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में बड़े निवेश को आकर्षित किया है, जिससे रोजगार और तकनीकी प्रगति में सुधार हुआ है।
एन.आई.पी. का लक्ष्य आधारभूत संरचना में सुधार करना है, जिसमें ₹111 लाख करोड़ का निवेश किया जाएगा। इससे लॉजिस्टिक्स लागत में कमी और औद्योगिक दक्षता में सुधार की उम्मीद है।
स्टार्टअप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी पहलों ने नवाचार और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया है। इन नीतियों से औद्योगिक क्षेत्रों में उद्यमिता और विदेशी निवेश में वृद्धि हुई है।
व्यापार करने में आसानी को सुधारने के लिए लागू किए गए सुधार, जैसे कर नियमों को सरल बनाना और अनुपालन बोझ को कम करना, औद्योगिक वातावरण को अनुकूल बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
निष्कर्ष
See lessऔद्योगिक संवृद्धि दर की कमी के कारणों में नीतिगत, आधारभूत संरचना और वित्तीय मुद्दे शामिल हैं। हाल के परिवर्तनों जैसे पी.एल.आई. योजना, एन.आई.पी., और स्टार्टअप इंडिया इन समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हो सकते हैं, अगर इनका प्रभावी ढंग से कार्यान्वयन किया जाए।
"Industrial growth rate has lagged behind in the overall growth of Gross-Domestic-Product (GDP) in the post-reform period." Give reasons. How far the recent changes in Industrial are capable of increasing the industrial growth rate? (250 words) [UPSC 2017]
Introduction In the post-reform period, India's industrial growth rate has lagged behind the overall Gross Domestic Product (GDP) growth. This disparity has been a concern for policymakers aiming to boost industrial sector performance. Reasons for Lagging Industrial Growth Regulatory and Policy ChalRead more
Introduction
In the post-reform period, India’s industrial growth rate has lagged behind the overall Gross Domestic Product (GDP) growth. This disparity has been a concern for policymakers aiming to boost industrial sector performance.
Reasons for Lagging Industrial Growth
Despite economic reforms, regulatory hurdles and bureaucratic red tape have impeded industrial growth. For instance, complex labor laws and inconsistent tax policies have created an unfriendly environment for business expansion.
Inadequate infrastructure such as poor transportation networks, unreliable power supply, and inefficient logistics has constrained industrial efficiency and competitiveness. The Logistics Performance Index for India highlights persistent issues in this area.
Access to finance remains a challenge for many industries, particularly small and medium enterprises (SMEs). High-interest rates and stringent lending norms have restricted their ability to invest in new technologies and expand operations.
Many Indian industries have been slow to adopt modern technologies and innovative practices, which has affected their productivity and global competitiveness. This is evident in the relatively lower research and development (R&D) expenditure compared to global standards.
Recent Changes and Their Impact
The PLI scheme introduced for sectors like electronics, pharmaceuticals, and textiles aims to boost manufacturing by offering incentives based on incremental production. For instance, the scheme has attracted significant investments in the electronics sector, leading to job creation and technological advancements.
The NIP aims to improve infrastructure, with an investment of ₹111 lakh crore in areas like transportation, energy, and urban development. Enhanced infrastructure is expected to reduce logistical costs and improve industrial efficiency.
Initiatives like Startup India and Make in India focus on fostering innovation and attracting foreign direct investment (FDI). These policies have led to increased entrepreneurial activity and foreign investment in industrial sectors.
The government has implemented reforms to improve the ease of doing business, such as simplifying tax regulations and reducing compliance burdens. These reforms are designed to make the industrial environment more conducive to growth.
Conclusion
See lessWhile industrial growth has lagged behind overall GDP growth due to regulatory, infrastructural, and financial challenges, recent changes like the PLI scheme, NIP, and ease of doing business reforms hold promise. If effectively implemented, these measures could significantly boost the industrial growth rate and enhance India’s global competitiveness.
भारत का उत्तर-पूर्वीय प्रदेश बहुत लम्बे समय से विद्रोह ग्रसित है। इस प्रदेश में सशस्त्र विद्रोह की अतिजीविता के मुख्य कारणों का विश्लेषण कीजिए। (150 words) [UPSC 2017]
परिचय भारत का उत्तर-पूर्वीय क्षेत्र लंबे समय से सशस्त्र विद्रोहों का शिकार रहा है। विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण इन विद्रोहों की निरंतरता को बनाए रखते हैं। सशस्त्र विद्रोह की अतिजीविता के मुख्य कारण जातीय विविधता और पहचान की राजनीति इस क्षेत्र में कई जातीय समूह हैं, जिनकी अलग-अलग सांस्कृतRead more
परिचय
भारत का उत्तर-पूर्वीय क्षेत्र लंबे समय से सशस्त्र विद्रोहों का शिकार रहा है। विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण इन विद्रोहों की निरंतरता को बनाए रखते हैं।
सशस्त्र विद्रोह की अतिजीविता के मुख्य कारण
इस क्षेत्र में कई जातीय समूह हैं, जिनकी अलग-अलग सांस्कृतिक और भाषाई पहचान है। अधिक स्वायत्तता या स्वतंत्रता की मांग विद्रोह को बढ़ावा देती है, जैसे एनएससीएन (नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड) और उल्फा (यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम) द्वारा।
उत्तर-पूर्व को भौगोलिक अलगाव और केंद्र सरकार द्वारा उपेक्षा का अहसास होता है। इससे अलगाव की भावना और स्वतंत्रता की मांग उत्पन्न होती है।
प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होते हुए भी, इस क्षेत्र की आर्थिक स्थिति खराब है। आवश्यक आधारभूत संरचना और रोजगार की कमी विद्रोहियों के लिए एक मजबूत आधार बनाती है।
उत्तर-पूर्व की पारगम्य सीमाएं जैसे म्यांमार, बांग्लादेश, और चीन के साथ सशस्त्र विद्रोहियों को हथियारों की तस्करी और आसानी से आवाजाही की सुविधा देती हैं।
कुछ विद्रोही समूहों को पड़ोसी देशों से सहायता मिलती है, जिससे उन्हें हथियार, प्रशिक्षण, और वित्तीय सहायता प्राप्त होती है, जिससे विद्रोह की निरंतरता बनाए रहती है।
निष्कर्ष
See lessउत्तर-पूर्व के सशस्त्र विद्रोह की निरंतरता की जटिलता जातीय तनाव, ऐतिहासिक उपेक्षा, अविकास, और बाहरी समर्थन के कारण है। इसका समाधान आर्थिक विकास, समावेशी शासन, और सुरक्षा उपायों के समन्वित प्रयासों के माध्यम से किया जा सकता है।
The North-East region of India has been infested with insurgency for a very long time. Analyze the major reasons for the survival of armed insurgency in this region. (150 words) [UPSC 2017]
Introduction The North-East region of India has been plagued by insurgency for decades. This insurgency is driven by various factors such as ethnic diversity, underdevelopment, and historical grievances. Despite government efforts, armed insurgency persists in many parts of the region. Major ReasonsRead more
Introduction
The North-East region of India has been plagued by insurgency for decades. This insurgency is driven by various factors such as ethnic diversity, underdevelopment, and historical grievances. Despite government efforts, armed insurgency persists in many parts of the region.
Major Reasons for the Survival of Armed Insurgency
The region is home to numerous ethnic groups, each with distinct cultures and languages. Ethnic tensions and demands for autonomy or secession have fueled insurgencies, as seen in groups like the NSCN (National Socialist Council of Nagaland) and ULFA (United Liberation Front of Assam).
The North-East has historically felt marginalized due to geographical isolation and perceived neglect by the central government. This has fostered a sense of alienation, leading to demands for independence or greater autonomy.
Despite its rich natural resources, the region has remained economically underdeveloped. Lack of infrastructure, unemployment, and limited opportunities have created fertile ground for insurgent groups to exploit local discontent.
The North-East shares borders with countries like Myanmar, Bangladesh, and China. These porous borders allow for the smuggling of arms and easy movement of insurgents, making it difficult for security forces to control the region effectively.
Some insurgent groups receive external support from neighboring countries, which provides them with arms, training, and financial assistance, enabling them to sustain their movements.
Conclusion
See lessThe survival of insurgency in the North-East is a complex issue influenced by ethnic tensions, historical grievances, underdevelopment, and external support. Addressing these challenges requires a multi-pronged approach involving economic development, inclusive governance, and enhanced security measures.
भारत में स्वतंत्रता के बाद कृषि में आई विभिन्न प्रकारों की क्रांतियों को स्पष्ट कीजिए। इन क्रांतियों ने भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा में किस प्रकार सहायता प्रदान की है ? (150 words) [UPSC 2017]
परिचय स्वतंत्रता के बाद, भारत में कई कृषि क्रांतियों ने कृषि उत्पादन को बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और गरीबी उन्मूलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन क्रांतियों ने कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों और संसाधनों का उपयोग बढ़ाया, जिससे आत्मनिर्भरता हासिल की गई। कृषि में आई प्रमुख क्रांतियाँ हरित क्रांRead more
परिचय
स्वतंत्रता के बाद, भारत में कई कृषि क्रांतियों ने कृषि उत्पादन को बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और गरीबी उन्मूलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन क्रांतियों ने कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों और संसाधनों का उपयोग बढ़ाया, जिससे आत्मनिर्भरता हासिल की गई।
कृषि में आई प्रमुख क्रांतियाँ
यह क्रांति उच्च उत्पादकता वाले बीजों (HYV), रासायनिक उर्वरकों और सिंचाई प्रौद्योगिकियों पर आधारित थी। पंजाब, हरियाणा, और उत्तर प्रदेश में गेहूं और चावल का उत्पादन बढ़ा, जिससे देश की खाद्य सुरक्षा में सुधार हुआ और अकाल की स्थितियों से बचा गया।
इसे ऑपरेशन फ्लड के नाम से भी जाना जाता है। इसके तहत दूध उत्पादन में वृद्धि की गई और भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बनाया गया। यह ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के अवसर प्रदान करने में सहायक रहा।
यह मत्स्य उत्पादन में वृद्धि लाने के लिए शुरू की गई, जिससे प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ी और तटीय एवं आंतरिक क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़े।
इसका उद्देश्य तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देना था, जिससे सरसों और सूरजमुखी के तेल के उत्पादन में वृद्धि हुई और खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम हुई।
यह मांस और पोल्ट्री उत्पादन में वृद्धि के लिए शुरू की गई, जिससे प्रोटीन की आपूर्ति बढ़ी और निर्यात क्षेत्र को समर्थन मिला।
गरीबी उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव
इन क्रांतियों ने कृषि उत्पादन में वृद्धि कर खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया और रोजगार के अवसरों को बढ़ाकर गरीबी उन्मूलन में मदद की। विशेष रूप से हरित और श्वेत क्रांति ने ग्रामीण क्षेत्रों में आय बढ़ाई और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को सशक्त किया।
निष्कर्ष
See lessइन कृषि क्रांतियों ने भारत को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया और गरीबी उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
Explain various types of revolutions, that took place in Agriculture after independence in India. How these revolutions have helped in poverty alleviation and food security in India? (150 words) [UPSC 2017]
Introduction After independence, India witnessed several agricultural revolutions aimed at increasing productivity, ensuring food security, and reducing poverty. These revolutions transformed India's agricultural landscape and helped in achieving self-sufficiency. Types of Agricultural Revolutions GRead more
Introduction
After independence, India witnessed several agricultural revolutions aimed at increasing productivity, ensuring food security, and reducing poverty. These revolutions transformed India’s agricultural landscape and helped in achieving self-sufficiency.
Types of Agricultural Revolutions
Introduced high-yield variety (HYV) seeds, fertilizers, and irrigation methods, primarily in wheat and rice. It led to a significant rise in food grain production, particularly in Punjab, Haryana, and Uttar Pradesh, helping India overcome food shortages.
Also known as Operation Flood, it focused on increasing milk production. Under the leadership of Dr. Verghese Kurien, India became the world’s largest producer of milk, improving rural incomes and nutrition levels.
Focused on fish production, particularly through aquaculture, enhancing protein availability and increasing livelihoods in coastal and inland areas.
Aimed at increasing the production of oilseeds to reduce dependency on imports. It boosted mustard and sunflower oil production, contributing to self-reliance in edible oils.
Focused on the growth of meat and poultry production, helping meet protein demands and supporting the export sector.
Impact on Poverty Alleviation and Food Security
These revolutions significantly increased food grain and livestock production, ensuring food security and reducing dependence on imports. The Green and White Revolutions were particularly instrumental in reducing rural poverty by providing income and employment opportunities. Enhanced agricultural productivity also helped in stabilizing prices, thus making food more affordable.
Conclusion
See lessThe various agricultural revolutions not only ensured food security but also played a vital role in poverty alleviation by boosting productivity, creating jobs, and enhancing incomes across rural India.
जी० डी० पी० में विनिर्माण क्षेत्र विशेषकर एम० एस० एम० ई० की बढ़ी हुई हिस्सेदारी तेज आर्थिक संवृद्धि के लिए आवश्यक है। इस संबंध में सरकार की वर्तमान नीतियों पर टिप्पणी कीजिए। (150 words)[UPSC 2023]
परिचय भारत में तेज आर्थिक संवृद्धि के लिए विनिर्माण क्षेत्र, विशेषकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) की जीडीपी में हिस्सेदारी को बढ़ाना आवश्यक है। वर्तमान में भारत के GDP में विनिर्माण का योगदान लगभग 17% है। इसे बढ़ाकर 25% तक ले जाने का लक्ष्य है, जो रोजगार सृजन और समावेशी विकास में सहायक होगा।Read more
परिचय
भारत में तेज आर्थिक संवृद्धि के लिए विनिर्माण क्षेत्र, विशेषकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) की जीडीपी में हिस्सेदारी को बढ़ाना आवश्यक है। वर्तमान में भारत के GDP में विनिर्माण का योगदान लगभग 17% है। इसे बढ़ाकर 25% तक ले जाने का लक्ष्य है, जो रोजगार सृजन और समावेशी विकास में सहायक होगा।
सरकार की नीतियाँ
सरकार ने PLI योजना के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल और कपड़ा जैसे क्षेत्रों में विनिर्माण को प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय सहायता दी है। यह MSMEs को आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनाकर उनके विकास में मदद करता है।
मेक इन इंडिया अभियान का उद्देश्य घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना और एफ़डीआई को आकर्षित करना है। इसके तहत एमएसएमई के लिए नियमों का सरलीकरण और बुनियादी ढांचे में सुधार किए गए हैं, जिससे विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार हो सके।
आत्मनिर्भर भारत पहल का मुख्य उद्देश्य भारत को स्वावलंबी बनाना है। इसके तहत स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा देने और MSMEs को डिजिटल प्रौद्योगिकियों के साथ सशक्त बनाने के लिए सहायता दी जा रही है।
MSMEs को संकट से उबारने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए आपातकालीन क्रेडिट गारंटी योजना (ECLGS) और मुद्रा योजना के तहत वित्तीय सहायता दी जा रही है।
निष्कर्ष
See lessPLI, मेक इन इंडिया, और आत्मनिर्भर भारत जैसी योजनाओं के माध्यम से MSMEs को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो GDP में विनिर्माण की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, बुनियादी ढाँचे और नवाचार में और सुधार की आवश्यकता है।